उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के बहुचर्चित और रोंगटे खड़े कर देने वाले ‘नीले ड्रम मर्डर केस’ (सौरभ राजपूत हत्याकांड) में अदालत ने ऐतिहासिक और सख्त फैसला सुनाया है। जिला एवं सत्र न्यायालय ने मर्चेंट नेवी अफसर सौरभ राजपूत की नृशंस हत्या के जुर्म में उनकी पत्नी मुस्कान रस्तोगी और उसके प्रेमी साहिल शुक्ला दोनों को फांसी (मृत्युदंड) की सजा सुनाई है। इसके साथ ही अदालत ने दोनों दोषियों पर 50-50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। यह मामला पूरे देश में काफी समय से चर्चित था, जिस पर आज अदालत ने अपना फैसला सुना दिया है।
अदालत ने अपने इस फैसले में अपराध की जघन्यता और पूर्व-नियोजित साजिश को रेखांकित करते हुए इसे ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ (दुर्लभ से दुर्लभतम) मामला माना। फैसला सुनाते समय न्यायाधीश ने महाभारत के प्रसंग और धर्म-न्याय के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए टिप्पणी की कि ‘दंड भी धर्म है’। अदालत ने कहा कि जब समाज में इस प्रकार की क्रूरता, अमानवीयता और विश्वासघात की पराकाष्ठा हो जाए, तो समाज में न्याय व्यवस्था का संतुलन बनाए रखने और भावी अपराधियों के मन में कानून का खौफ पैदा करने के लिए दोषियों को कड़ा से कड़ा दंड देना ही सच्चा धर्म और न्याय है।
लंदन से लौटे मर्चेंट नेवी अफसर पति की खौफनाक हत्या की पूरी दास्तान
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत मार्च 2025 में हुई थी। लंदन में काम करने वाले मर्चेंट नेवी अफसर सौरभ राजपूत 24 फरवरी 2025 को अपने घर मेरठ वापस लौटे थे। घर में 25 फरवरी को पत्नी मुस्कान का जन्मदिन और 28 फरवरी को बेटी पीहू का जन्मदिन धूमधाम से मनाया गया। हालांकि, पर्दे के पीछे पत्नी मुस्कान अपने प्रेमी साहिल शुक्ला के साथ मिलकर सौरभ को हमेशा के लिए रास्ते से हटाने की साजिश रच रही थी।
3 मार्च 2025 की रात को साजिश के तहत सौरभ को खाने/कॉफी में भारी मात्रा में नींद की दवाइयां दी गईं। जब सौरभ बेहोश हो गया, तब मुस्कान और साहिल ने मिलकर धारदार चाकू से ताबड़तोड़ वार कर उसकी निर्मम हत्या कर दी। हत्या के बाद साक्ष्यों को मिटाने के लिए उन्होंने शव के कई टुकड़े किए और बाजार से खरीदे गए नीले रंग के प्लास्टिक ड्रम में शव के अवशेषों को डालकर ऊपर से सीमेंट और रेत का पक्का घोल भरकर सील कर दिया।
हत्या के बाद शिमला-मनाली की सैर और परिवार को गुमराह करने की साजिश
सौरभ की नृशंस हत्या करने के अगले ही दिन 4 मार्च को मुस्कान अपनी मासूम बच्ची को मायके छोड़ आई और प्रेमी साहिल शुक्ला के साथ शिमला व मनाली की वादियों में घूमने निकल गई। इस दौरान उसने सौरभ के मोबाइल फोन से परिजनों को लगातार मैसेज भेजे ताकि लोगों को लगे कि सौरभ खुद कहीं बाहर चला गया है और किसी को शक न हो।
जब कई दिनों तक सौरभ का कोई अता-पता नहीं चला और किराए के मकान पर ताला लटका मिला, तो सौरभ के भाई बबलू को अनहोनी की आशंका हुई। 18 मार्च 2025 को पुलिस ने जब घर का ताला तोड़कर जांच शुरू की, तो कमरे में रखे नीले ड्रम से आ रही भयंकर दुर्गंध के बाद सीमेंट को तोड़ा गया, जहां से सौरभ का क्षत-विक्षत शव बरामद हुआ। पुलिस ने तुरंत जाल बिछाकर हिमाचल से लौटे मुस्कान और साहिल को गिरफ्तार कर लिया।
13 महीने का लंबा ट्रायल, 126 तारीखें और 22 गवाहों की मजबूत गवाही
इस हाई-प्रोफाइल मर्डर केस का ट्रायल मेरठ की जिला अदालत में करीब 13 महीने तक चला। पुलिस प्रशासन और अभियोजन पक्ष ने इस मामले में बेहद पुख्ता केस तैयार किया था। लगभग 1,000 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की गई थी। कोर्ट में चले ट्रायल के दौरान कुल 126 सुनवाई हुई और 22 महत्वपूर्ण गवाहों के बयान दर्ज किए गए।
- दुकानदारों की गवाही: अदालत में उन दुकानदारों की गवाही सबसे निर्णायक साबित हुई, जिनसे साहिल और मुस्कान ने प्लास्टिक का नीला ड्रम, सीमेंट, रेत, चाकू और नींद की गोलियां खरीदी थीं।
- फोरेंसिक व परिस्थितिजन्य साक्ष्य: पुलिस द्वारा पेश किए गए फोरेंसिक साक्ष्य, कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (CDR), और शिमला-मनाली यात्रा की लोकेशन रिपोर्ट ने दोनों आरोपियों के दावों की धज्जियां उड़ा दीं।
- दोषी करार होने पर रो पड़े थे आरोपी: गत 30 सितंबर 2026 को अदालत ने दोनों को हत्या (IPC 302) और साक्ष्य मिटाने (IPC 201) का दोषी ठहराया था, जिसके बाद आज 14 अक्टूबर 2026 को सजा-ए-मौत का औपचारिक ऐलान कर दिया गया।
‘इंसाफ की जीत हुई’: सौरभ के परिवार ने जताया कोर्ट का आभार
अदालत द्वारा मुस्कान और साहिल को फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद मृतक सौरभ राजपूत के भाई राहुल राजपूत और उनकी बुजुर्ग मां ने राहत की सांस ली। बिलखते हुए सौरभ के परिजनों ने मीडिया को बताया कि पिछले डेढ़ साल से उनका पूरा परिवार मानसिक और आर्थिक रूप से टूट चुका था। वे पिछले 18 महीनों से केवल एक ही मांग कर रहे थे कि जिस बेरहमी से उनके बेटे की हत्या की गई, दोषियों को भी वैसी ही सख्त से सख्त सजा (फांसी) मिलनी चाहिए।
सौरभ के परिजनों ने कहा कि आज कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले से उनका न्याय व्यवस्था पर विश्वास और अधिक मजबूत हो गया है। यह फैसला समाज में उन लोगों के लिए एक बड़ा सबक साबित होगा जो रिश्तों को तार-तार कर घिनौने अपराधों को अंजाम देने की जुर्रत करते हैं। फैसला सुनने के बाद अदालत परिसर में सुरक्षा के बेहद कड़े इंतजाम किए गए थे।