भारतीय राजनीति में इन दिनों देश के निर्वाचन आयोग (Election Commission) और विपक्षी दलों के बीच टकराव की स्थिति लगातार गहराती जा रही है। इसी कड़ी में एक बहुत बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है, जिसके तहत लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सहित देश के 13 प्रमुख विपक्षी नेताओं ने निर्वाचन आयोग के कामकाज, पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाते हुए सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) का दरवाजा खटखटाया है।
मिली आधिकारिक जानकारियों के अनुसार, विपक्ष के इन नेताओं द्वारा दायर की गई महत्वपूर्ण याचिकाओं पर आगामी 26 अक्टूबर को देश की सर्वोच्च अदालत में सुनवाई हो सकती है। हालांकि, न्यायिक प्रक्रियाओं और नियमों के मुताबिक इस तारीख को अभी पूरी तरह से अंतिम या आधिकारिक रूप से तय नहीं माना जा रहा है, क्योंकि मामले की वास्तविक सुनवाई तभी सुनिश्चित होगी जब इन याचिकाओं को अदालत की आधिकारिक कॉज लिस्ट में विधिवत रूप से सूचीबद्ध (Listed) कर दिया जाएगा।
किन-किन दिग्गजों ने दाखिल की है यह याचिका?
निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले नेताओं में देश के कई जाने-माने राजनीतिक चेहरे शामिल हैं।
इस संयुक्त कानूनी कदम में कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेता और सांसद राहुल गांधी के अलावा पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी प्रमुख भूमिका निभाई है।
इसके साथ ही तृणमूल कांग्रेस (TMC) के वरिष्ठ नेता सौगत रॉय, समाजवादी पार्टी (SP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के प्रमुख नेता तेजस्वी यादव भी इस याचिका में शामिल हैं।
विपक्षी एकता का प्रदर्शन करते हुए इस सूची में शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) गुट के सांसद संजय राउत, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M) के नेता एम.ए. बेबी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के डी. राजा, झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की नेता महुआ माझी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP-शरद पवार गुट) की वरिष्ठ नेत्री सुप्रिया सुले के नाम भी प्रमुखता से दर्ज हैं।
याचिका में किन लोगों और संस्थाओं को बनाया गया है पक्षकार?
विपक्षी दलों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई इस विस्तृत याचिका में देश की सर्वोच्च चुनाव संस्था और इसके प्रमुख अधिकारियों को प्रतिवादी (Respondents) बनाया गया है।
इस याचिका में मुख्य रूप से भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) को एक संस्था के रूप में पक्षकार बनाया गया है।
इसके अतिरिक्त, मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के साथ-साथ निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी को भी इस कानूनी मुकदमे में व्यक्तिगत और आधिकारिक रूप से पक्षकार के रूप में शामिल किया गया है।
विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग के इन शीर्ष अधिकारियों के कार्यकाल और निर्णयों के दौरान चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर विपरीत प्रभाव पड़ा है, जिसकी न्यायिक समीक्षा बेहद आवश्यक हो चुकी है।
मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर हुआ था बड़ा मार्च
आपको बता दें कि यह कानूनी लड़ाई अचानक शुरू नहीं हुई है, बल्कि इसके पीछे पिछले कुछ दिनों से चल रहा उग्र राजनीतिक संघर्ष मुख्य वजह रहा है।
कुछ दिन पूर्व ही मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के तत्काल इस्तीफे की पुरजोर मांग करते हुए राहुल गांधी और ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के तमाम शीर्ष नेताओं ने संसद भवन से लेकर देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट तक एक ऐतिहासिक और लंबा पैदल मार्च निकाला था।
इस मार्च के दौरान विपक्षी नेताओं ने हाथों में तख्तियां लेकर चुनाव आयोग के कामकाज, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM), और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) जैसी चुनावी प्रक्रियाओं पर तीखे सवाल उठाए थे और देश के लोकतंत्र को बचाने की गुहार लगाई थी।
मुख्य न्यायाधीश से मुलाकात का अनुरोध हुआ था अस्वीकार
इस पूरे राजनीतिक विवाद के दौरान विपक्ष का आक्रामक रुख लगातार बना हुआ है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस कानूनी और प्रशासनिक गतिरोध से पहले विपक्ष के शीर्ष नेता राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत से मुलाकात करने का औपचारिक अनुरोध किया था।
हालांकि, न्यायिक परंपराओं और प्रोटोकॉल का हवाला देते हुए मुख्य न्यायाधीश ने इस अनौपचारिक मुलाकात के अनुरोध को स्वीकार नहीं किया था, जिसके बाद विपक्ष ने कानूनी मार्ग अपनाते हुए अदालत में औपचारिक याचिकाएं दायर करने का निर्णय लिया।
संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर छिड़ी देशव्यापी बहस
विपक्षी दलों द्वारा चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान के खिलाफ सीधे सुप्रीम कोर्ट का रुख करने के बाद देश की राजनीति में एक नई और तीखी बहस छिड़ गई है।
एक तरफ जहां विपक्षी दलों का यह साफ तौर पर कहना है कि देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने वाले आयोग को पूरी तरह पारदर्शी होना चाहिए और विपक्ष की चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
वहीं दूसरी तरफ, सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) और एनडीए गठबंधन ने विपक्ष के इस कदम को चुनाव में अपनी आसन्न हार से पहले का बहाना करार दिया है।
सत्तारूढ़ दल का कहना है कि जब भी विपक्ष चुनाव हारता है या उसे जनता का समर्थन नहीं मिलता, वह देश की स्वायत्त और स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर बेवजह की कीचड़ उछालने लगता है।
आगामी 26 अक्टूबर को जब सुप्रीम कोर्ट में इस हाई-प्रोफाइल मामले की सुनवाई शुरू होगी, तब देश की निगाहें अदालत के रुख और इस कानूनी लड़ाई के संभावित राजनीतिक परिणामों पर टिकी रहेंगी।