देश की राजधानी नई दिल्ली में हाल ही में सुप्रीम कोर्ट परिसर के बाहर और आसपास हुए राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों को लेकर सियासत लगातार गर्माती जा रही है। मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के खिलाफ लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में ‘इंडिया’ गठबंधन के नेताओं और कार्यकर्ताओं द्वारा किए गए प्रदर्शनों पर अब वकीलों के संगठनों ने भी तीखी आपत्ति जताई है। दलित वकीलों के एक प्रमुख संगठन ने राहुल गांधी के इस कदम की कड़ी निंदा करते हुए उन्हें आड़े हाथों लिया है और देश की जनता से सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग की है। संगठन का कहना है कि देश की सर्वोच्च अदालत जैसे पवित्र और संवैधानिक स्थान पर इस तरह का राजनीतिक दबाव बनाना और प्रदर्शन करना न्यायपालिका की गरिमा के खिलाफ है।
दलित वकीलों के संगठन ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न्यायपालिका देश के संविधान का अंतिम स्तंभ है और इसकी स्वायत्तता को सुरक्षित रखना हर राजनीतिक दल और नागरिक का नैतिक दायित्व है। वकीलों का आरोप है कि राहुल गांधी और उनके सहयोगियों ने अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए देश की सर्वोच्च अदालत की मर्यादा को ताक पर रख दिया, जो कि एक बेहद अनुचित और दुर्भाग्यपूर्ण मिसाल पेश करता है। इस तीखे विरोध के सामने आने के बाद से राष्ट्रीय राजधानी की राजनीति में पक्ष और विपक्ष के बीच एक नया वैचारिक और कानूनी टकराव शुरू हो गया है, जिससे आने वाले दिनों में सियासी पारा और अधिक चढ़ने के पूरे आसार नजर आ रहे हैं।
अदालत परिसरों में राजनीतिक प्रदर्शनों पर रोक लगाने की मांग
दलित वकीलों के संगठन ने केवल राहुल गांधी से माफी की मांग ही नहीं की है, बल्कि उन्होंने देश की न्यायपालिका से यह भी पुरजोर आग्रह किया है कि वह अदालत परिसरों के भीतर या आसपास इस प्रकार के राजनीतिक हंगामों, धरना-प्रदर्शनों और नारेबाजी पर पूरी तरह से रोक लगाने के लिए कड़े दिशानिर्देश जारी करे। वकीलों का तर्क है कि जब देश के विभिन्न मामलों की सुनवाई शीर्ष अदालत में चल रही हो और न्याय की प्रक्रिया अपने तय नियमों के तहत आगे बढ़ रही हो, तब अदालत के बाहर इस तरह का शक्ति प्रदर्शन करना सीधे तौर पर न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने और जनता के मन में संदेह पैदा करने का एक सुनियोजित प्रयास है।
संगठन के पदाधिकारियों ने इस बात पर भी चिंता व्यक्त की कि यदि राजनीतिक दलों द्वारा अदालतों को अपने राजनीतिक अड़े के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा, तो आम जनता का न्याय व्यवस्था से धीरे-धीरे विश्वास उठ सकता है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में हर राजनीतिक दल को अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन उसके लिए संसद भवन, जंतर-मंतर या अन्य निर्धारित राजनीतिक स्थल मौजूद हैं, न कि देश की सर्वोच्च अदालत का प्रांगण। इस तरह के प्रदर्शनों से न्यायपालिका की निष्पक्ष छवि को भारी ठेس पहुंचती है, जिसे किसी भी कीमत पर सहन नहीं किया जाना चाहिए।
राजनीतिक गलियारों में छिड़ी बहस, कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने
दलित वकीलों के संगठन द्वारा राहुल गांधी को घेरे जाने और सार्वजनिक माफी की मांग किए जाने के बाद देश के राजनीतिक दलों के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। एक तरफ जहां भारतीय जनता पार्टी (BJP) और एनडीए के नेताओं ने वकीलों के इस बयान का समर्थन करते हुए राहुल गांधी पर संवैधानिक संस्थाओं को लगातार कमजोर करने का आरोप लगाया है, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी ने इन तमाम आरोपों को खारिज करते हुए इसे विपक्ष की मुखर आवाज को दबाने का एक राजनीतिक षड्यंत्र करार दिया है। कांग्रेस का कहना है कि जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों और संविधान की रक्षा के लिए वे सड़क से लेकर अदालत तक हर वैध तरीके से संघर्ष करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं, और उनके इस संघर्ष को कमजोर करने के लिए ऐसे हथकंडे अपनाए जा रहे हैं।