जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने लद्दाख और कारगिल के नेताओं को एक महत्वपूर्ण सलाह दी है। उन्होंने कहा कि अगर केंद्र सरकार कोई बड़ा वादा करे तो सिर्फ उसकी बातों पर भरोसा मत कीजिए। उससे कहिए कि अपना वादा कागज पर लिखकर दे और उस पर हस्ताक्षर भी करे।
बुधवार को पुलवामा में समीक्षा बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में उमर अब्दुल्ला ने यह बात कही। उन्होंने खुद को लद्दाख के नेताओं का दोस्त और बड़ा भाई बताते हुए यह सलाह दी। उनके मुताबिक, केंद्र सरकार के किसी भी मौखिक आश्वासन पर तब तक भरोसा नहीं करना चाहिए, जब तक वह लिखित रूप में और हस्ताक्षर के साथ न मिले।
राज्य का दर्जा बहाल करने का उदाहरण
अपनी बात समझाने के लिए उमर अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा लौटाने के वादे का उदाहरण दिया। उनका कहना है कि जम्मू-कश्मीर के लोगों को भी चुनाव के बाद राज्य का दर्जा बहाल करने का भरोसा दिया गया था, लेकिन करीब दो साल बाद भी यह वादा पूरा नहीं हुआ। इसी अनुभव के आधार पर उन्होंने लद्दाख और कारगिल के नेताओं से केंद्र सरकार से मिलने वाले आश्वासनों को लिखित रूप में लेने की सलाह दी। जरूरत हो तो इसके लिए हलफनामा भी मांगा जा सकता है।
उन्होंने याद दिलाया कि यहां की जनता से भी चुनाव खत्म होते ही राज्य का दर्जा फौरन बहाल करने की मौखिक बात कही गई थी। उस भरोसे को करीब दो साल बीत चुके हैं, मगर जमीन पर कुछ नहीं बदला। इसी अनुभव को सामने रखते हुए लद्दाख के प्रतिनिधियों को सतर्क रहने को कहा गया कि केवल बातचीत में मिली तसल्ली पर कभी भरोसा न करें।
हलफनामे की शक्ल में मांगें गारंटी
उन्होंने लद्दाख और कारगिल के नेतृत्व को सुझाव दिया कि केंद्र से मिलने वाले किसी भी आश्वासन को कानूनी तौर पर पुख्ता कराएं। मुमकिन हो तो उसे एक एफिडेविट के रूप में लें, जिससे भविष्य में किसी तरह का भ्रम या मुकरने की गुंजाइश न बचे।
बातचीत के आखिर में उन्होंने यह साफ किया कि लद्दाख की अपनी स्थानीय समस्याएं हैं, जो जम्मू-कश्मीर के मुद्दों से मेल नहीं खातीं। इसके बावजूद, सरकारी फैसलों और वादों की हकीकत तभी मानी जा सकती है जब उनके पास पक्का कागजी प्रमाण हो। उनकी पूरी बात का निचोड़ यही है कि राजनीति में बड़ी बातें हवा में तैरती रह जाती हैं, इसलिए भरोसा हमेशा लिखित दस्तावेज पर ही करना चाहिए।