दक्षिण भारत के राज्य केरल की राजनीति में एक बेहद दिलचस्प और विरोधाभासी राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है, जिसने राष्ट्रीय स्तर पर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में इसी चुनाव प्रक्रिया और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के साए में भारी बहुमत हासिल कर सत्ता की बागडोर संभालने वाली कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार ने अब उसी निर्वाचन प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) की कार्यप्रणाली के खिलाफ कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। केरल विधानसभा द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने और एसआईआर प्रक्रिया पर सवाल उठाने वाले प्रस्ताव के पारित होने के बाद से राजनीतिक गलियारों में सरगर्मी तेज हो गई है।
भारतीय जनता पार्टी (BJP) और अन्य राजनीतिक दलों ने कांग्रेस पार्टी और केरल सरकार के इस दोहरे रुख पर कड़ा प्रहार किया है। आलोचकों का कहना है कि जिस चुनावी प्रक्रिया, वोटर लिस्ट और प्रशासनिक व्यवस्था के जरिए कांग्रेस गठबंधन ने राज्य में ऐतिहासिक जीत दर्ज की और सत्ता प्राप्त की, आज राजनीतिक विरोध के चलते उसी पूरी प्रक्रिया की वैधता पर सवाल खड़े करना पार्टी के अंतर्विरोध को उजागर करता है। इस कदम से विपक्षी दलों को कांग्रेस को घेरने का एक बड़ा वैचारिक और राजनीतिक हथियार मिल गया है।
केरल विधानसभा में पारित प्रस्ताव के मुख्य बिंदु और आपत्तियां
केरलम के मुख्यमंत्री वी.डी. सतीसन की अगुवाई में राज्य विधानसभा में पेश किए गए इस प्रस्ताव में कई गंभीर मांगें और सवाल उठाए गए हैं:
- मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग: प्रस्ताव में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटाने के लिए औपचारिक कार्रवाई की संस्तुति की गई है।
- मतदाताओं के नाम बहाली: एसआईआर (SIR) प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से कथित तौर पर हटाए गए “योग्य मतदाताओं” के नामों को तुरंत दोबारा सूची में शामिल करने पर जोर दिया गया है।
- चयन प्रक्रिया में बदलाव की मांग: भविष्य में चुनाव आयुक्तों के चयन पैनल में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को पुनः शामिल करने और चयन प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाने की वकालत की गई है।
शशि थरूर के बयानों और चुनावी जीत के बीच विरोधाभास
राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि कुछ समय पूर्व वरिष्ठ कांग्रेस नेता और सांसद शशि थरूर ने सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया था कि इस पूरी चुनावी प्रक्रिया और पुनरीक्षण के बाद हुए चुनावों ने ही पार्टी को राज्य में विधानसभा चुनाव जीतने और जनता का जनादेश प्राप्त करने में मदद की थी। ऐसे में, जब पार्टी के वरिष्ठ नेता खुद इस प्रक्रिया को चुनावी सफलता का आधार मान चुके हैं, तब राज्य सरकार द्वारा इसके खिलाफ आधिकारिक प्रस्ताव पारित करना पार्टी के भीतर वैचारिक स्पष्टता की कमी को दर्शाता है।
भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने इस मुद्दे पर तंज कसते हुए यह भी सवाल उठाया है कि क्या इस पूरी प्रक्रिया के दौरान राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के रूप में कार्य करने वाले अधिकारियों और प्रशासनिक मशीनरी की भूमिका को भी कटघरे में खड़ा किया जाएगा। बहरहाल, केरल सरकार के इस आक्रामक कदम ने राष्ट्रीय राजनीति में चुनाव आयोग और मतदाता सूची के पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े विवाद को एक बार फिर केंद्र बिंदु में ला दिया है, जिसपर आने वाले दिनों में और तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल सकती हैं।