ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में विदेशी नेताओं के लिए परोसे गए पूरी तरह शाकाहारी भोजन को लेकर उठे विवाद के बीच प्रधानमंत्री आवास और सरकारी भोज की खान-पान परंपरा एक बार फिर चर्चा में है। इसी विषय पर प्रकाशित नई किताब ‘द प्राइम मिनिस्टर्स टेबल: डेलिकेसीज एंड डिप्लोमेसीज फ्रॉम द एरा ऑफ नेहरू टू मोदी’ में देश के प्रधानमंत्रियों की भोजन संबंधी पसंद, उनके घरों की रसोई, सरकारी भोज और विदेशी मेहमानों के लिए तैयार किए जाने वाले व्यंजनों से जुड़े कई किस्से दर्ज किए गए हैं। किताब को पत्रकार पुराबी श्रीधर और संगीता सिंह ने तैयार किया है और इसके लिए उन्होंने सात साल से अधिक समय तक परिवारों, दोस्तों, कर्मचारियों और शेफ से बातचीत की।
यह किताब सिर्फ प्रधानमंत्रियों की निजी पसंद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी बताती है कि भारत में आधिकारिक भोज का स्वरूप समय के साथ कैसे बदला। किताब के मुताबिक, स्वतंत्रता के बाद जवाहरलाल नेहरू ने सरकारी भोज की पुरानी औपनिवेशिक शैली में बदलाव किया और उसमें भारतीय रंग शामिल किया। गुलदस्तों की जगह मालाएं, भारतीय व्यंजन और यहां तक कि टोस्ट के लिए शराब की जगह संतरे के रस जैसी चीजें इस बदलाव का हिस्सा बनीं। 1956 के एक सरकारी नोट में नेहरू के बारे में लिखा गया था कि उन्हें बहुत ज्यादा मसाले और मिर्च की आदत नहीं थी।
नेहरू से इंदिरा गांधी तक, सरकारी भोज में बदली भारतीय थाली
किताब में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्ता से जुड़ा एक दिलचस्प प्रसंग भी है। 1962 में लखनऊ में उनके लिए पूरी तरह शाकाहारी भोज तैयार किया गया था। शेफ इम्तियाज कुरैशी ने लौकी से ‘मछली’, कटहल से ‘मुर्ग मुसल्लम’ और बैंगन से चिकन लेग जैसा दिखने वाला व्यंजन तैयार किया। नेहरू ने इन व्यंजनों के नामों को लेकर मजाक भी किया और शेफ की रचनात्मकता की तारीफ की।
इंदिरा गांधी के दौर में सरकारी भोज के मेन्यू को लेकर प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत रुचि का असर और स्पष्ट दिखाई देता था। किताब में शेफ सुधीर सिबल के हवाले से बताया गया है कि 1983 के राष्ट्रमंडल शासनाध्यक्षों की बैठक के लिए तैयार किए जा रहे मेन्यू में जब टर्की रोस्ट शामिल किया गया, तो इंदिरा गांधी ने पूछा कि मेहमानों को बिरयानी क्यों नहीं दी जा सकती। इसके बाद मेन्यू में बदलाव किया गया। किताब में यह भी बताया गया है कि इंदिरा गांधी मेहमानों और भोज की व्यवस्था को लेकर काफी बारीकी से ध्यान देती थीं।
राजीव गांधी के दौर में सरकारी भोज में पश्चिमी शैली की प्लेटेड और नई फ्रांसीसी शैली की कुकिंग का प्रभाव बढ़ा। शेफ सुधीर सिबल और एमएस गुप्ता ने ब्रिटेन जाकर प्रशिक्षण लिया। इसके बाद सरकारी रात्रिभोज में बेबी नान के साथ चिकन लीवर पाटे, टमाटर-नारियल सूप और गाजर-संतरे के सूप जैसे व्यंजन शामिल होने लगे। किताब में सिबल के हवाले से यह भी कहा गया है कि भोजन और मेज की पूरी सजावट में सोनिया गांधी की भी भूमिका रहती थी।
लाल बहादुर शास्त्री की भोजन संबंधी पसंद सादगी से जुड़ी थी। वह सख्त शाकाहारी थे। वहीं मोरारजी देसाई के शराब से परहेज का असर विदेशी दौरों के आधिकारिक भोज पर भी दिखाई देता था। 1977 में सोवियत नेता लियोनिद ब्रेजनेव के साथ भोज में उनके लिए शराब की जगह मिनरल वाटर से टोस्ट किया गया। चंद्रशेखर के दौर में भी विशेष सुरक्षा समूह से जुड़े भोजों में शराब नहीं परोसे जाने का उल्लेख किताब में मिलता है।
पीवी नरसिम्हा राव के लिए दाल और फुल्का जैसे साधारण भोजन को प्राथमिकता दी जाती थी। यहां तक कि सरकारी भोज में भी उनके लिए ताजा फुल्के बनाने के लिए अलग रसोइये की व्यवस्था की जाती थी। एचडी देवगौड़ा भी विदेशों में आधिकारिक टोस्ट के दौरान शराब का सेवन नहीं करते थे। किताब में एक प्रसंग के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के प्रमुख माइकल कैमडेसस के सम्मान में आयोजित दोपहर के भोजन के दौरान देवगौड़ा ने रागी की गोली पानी के साथ खाई।
अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में सरकारी और निजी भोज में भारतीय स्ट्रीट फूड की मौजूदगी भी देखने को मिली। किताब में पूर्व अशोक होटल महाप्रबंधक राजीव माकिन के हवाले से बताया गया है कि वाजपेयी की निजी पार्टियों में पुरानी दिल्ली के चाट और जलेबी वाले बुलाए जाते थे। 2001 में आगरा शिखर सम्मेलन के दौरान पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ की पत्नी ने परोसे गए मुलिगटावनी सूप की रेसिपी भी मांगी थी।
आईके गुजराल के घर में उनकी पत्नी शीला गुजराल की मेजबानी और भोजन की पसंद का विशेष प्रभाव था। किताब के अनुसार, वह कम घी और तेल वाले भोजन को पसंद करती थीं, लेकिन सरकारी भोज में मेहमानों के लिए अपेक्षाकृत समृद्ध भोजन परोसा जाता था। पीवी नरसिम्हा राव और आईके गुजराल से लेकर मनमोहन सिंह तक, प्रधानमंत्री के निजी भोजन और मेहमानों के लिए तैयार किए जाने वाले आधिकारिक मेन्यू के बीच अंतर भी कई प्रसंगों में सामने आता है।
मनमोहन सिंह के दौर में उनकी पत्नी गुरशरण कौर ने कई बार मेन्यू और भोजन की तैयारी पर व्यक्तिगत ध्यान दिया। किताब में बताया गया है कि वह शेफ को घर बुलाकर घिया कोफ्ते जैसे व्यंजनों की तैयारी का तरीका समझाती थीं। मनमोहन सिंह ने अपने कार्यकाल के दौरान बड़ी संख्या में विदेश यात्राएं कीं और उनके कई विदेशी दौरों में स्थानीय तथा भारतीय भोजन को मेन्यू में जगह मिली।
नरेंद्र मोदी के दौर में उनके शाकाहारी भोजन की पसंद का असर आधिकारिक मेन्यू में भी दिखाई देता है। किताब के मुताबिक, 2017 में इजरायल में उनके लिए भारतीय शाकाहारी भोजन तैयार किया गया था, जबकि 2015 में संयुक्त अरब अमीरात के भोज के लिए शेफ संजीव कपूर ने भारतीय और अरब व्यंजनों का विशेष मेन्यू तैयार किया था। किताब में कपूर के हवाले से मोदी की यह बात भी दर्ज है कि किसी देश की संस्कृति को समझने के लिए उसके भोजन को जानना जरूरी है।
हाल ही में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में विदेशी मेहमानों के लिए पूरी तरह शाकाहारी भोजन परोसे जाने को लेकर राजनीतिक बहस भी हुई। कांग्रेस नेताओं ने इसे भारत की खान-पान की विविधता के संदर्भ में सवाल उठाया, जबकि इस तरह के आधिकारिक भोजों में मेन्यू और प्रोटोकॉल को लेकर अलग-अलग व्यवस्थाएं पहले भी रही हैं।
नई किताब का बड़ा निष्कर्ष यह है कि प्रधानमंत्री की मेज सिर्फ भोजन की पसंद का मामला नहीं रही, बल्कि समय-समय पर इसमें भारतीय संस्कृति, क्षेत्रीय खान-पान, व्यक्तिगत आदतों, मेजबानी और कूटनीति की झलक भी दिखाई देती रही है। किताब के लेखकों ने प्रधानमंत्रियों के परिवारों, सहयोगियों, शेफ और कर्मचारियों से मिले अनुभवों के जरिए इन पहलुओं को दर्ज किया है। इस लिहाज से सरकारी भोजों के मेन्यू भारत के राजनीतिक और सामाजिक इतिहास को देखने का एक अलग नजरिया भी पेश करते हैं।