उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन को लेकर चल रही खींचतान अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दो प्रमुख मुस्लिम नेताओं इमरान मसूद और इकरा हसन की बयानबाजी तक पहुंच गई है। सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद जहां सपा पर जल्द से जल्द सीट बंटवारा तय करने का दबाव बना रहे हैं, वहीं कैराना से सपा सांसद इकरा हसन ने कांग्रेस और मसूद के रुख पर पलटवार किया है। दोनों नेताओं के बयानों को सपा-कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग और राजनीतिक प्रभाव को लेकर चल रही रस्साकशी से जोड़कर देखा जा रहा है।
इमरान मसूद पिछले कुछ समय से लगातार यह मांग कर रहे हैं कि सपा और कांग्रेस के बीच सीटों का बंटवारा जल्द तय होना चाहिए। उनका कहना है कि गठबंधन को अक्टूबर तक अंतिम रूप दे देना चाहिए, ताकि कांग्रेस अपनी चुनावी रणनीति और उम्मीदवारों की तैयारी स्पष्ट रूप से शुरू कर सके। मसूद ने यह भी कहा है कि अगर गठबंधन में देरी होती है तो कांग्रेस अपनी स्थिति कमजोर होने से बचाने के लिए अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी कर सकती है। उन्होंने कांग्रेस के बिना बीजेपी का मुकाबला करने को लेकर भी अपनी राय सार्वजनिक रूप से रखी है।
कांग्रेस की तरफ से मसूद के बयानों को लेकर पहले भी समर्थन का संकेत दिया गया है। जुलाई में आजतक के एक कार्यक्रम में यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने उन्हें पार्टी का मजबूत नेता बताया था और कहा था कि कांग्रेस के कार्यकर्ता उनके साथ खड़े हैं। वहीं पार्टी के यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने सपा-कांग्रेस गठबंधन को लेकर कहा था कि दोनों दल साथ मिलकर 2027 का चुनाव लड़ने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
इकरा हसन ने क्यों किया पलटवार?
इमरान मसूद के बयानों के जवाब में सपा सांसद इकरा हसन ने कहा कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी का मुकाबला करने में अखिलेश यादव सक्षम हैं। उन्होंने कांग्रेस के अकेले चुनाव लड़ने की स्थिति पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि अगर गठबंधन बना रहता है तो ठीक है, लेकिन अगर गठबंधन टूटता है तो इसका नुकसान कांग्रेस को हो सकता है। इकरा के इस बयान के बाद सपा और कांग्रेस के बीच चल रही राजनीतिक बयानबाजी और तेज हो गई है।
इमरान मसूद और इकरा हसन दोनों पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आते हैं और दोनों ही अपने-अपने दलों में प्रमुख मुस्लिम चेहरों के तौर पर सक्रिय हैं। मसूद सहारनपुर से कांग्रेस सांसद हैं, जबकि इकरा हसन कैराना से सपा सांसद हैं। ऐसे में दोनों के बीच सामने आई बयानबाजी को सिर्फ व्यक्तिगत मतभेद के तौर पर नहीं, बल्कि पश्चिमी यूपी में सपा और कांग्रेस के राजनीतिक प्रभाव तथा आगामी विधानसभा चुनाव के लिए सीटों के बंटवारे से जुड़े व्यापक समीकरण के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। हालांकि, दोनों दलों के बीच अंतिम सीट-बंटवारे का आधिकारिक फॉर्मूला अभी सामने नहीं आया है।
सपा और कांग्रेस ने 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव साथ लड़ने की बात कही है, लेकिन सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों दलों की प्राथमिकताएं अलग दिखाई दे रही हैं। कांग्रेस चाहती है कि सीटों की संख्या और निर्वाचन क्षेत्रों की पहचान जल्द तय हो जाए, ताकि पार्टी अपने उम्मीदवारों और संगठन को उसी हिसाब से तैयार कर सके। दूसरी ओर सपा जल्दबाजी नहीं करना चाहती और पहले अपने संगठन तथा जमीनी तैयारियों को मजबूत करने के बाद सीट शेयरिंग पर चर्चा करना चाहती है।
इमरान मसूद का दावा है कि कांग्रेस ने सपा के सामने 150 से ज्यादा सीटों की सूची रखी है। हालांकि, सपा की ओर से औपचारिक रूप से इस दावे की पुष्टि नहीं हुई है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक दोनों दलों के बीच अभी तक औपचारिक सीट-बंटवारा बातचीत शुरू नहीं हुई है और दोनों पक्ष अपने-अपने स्तर पर चुनावी तैयारी कर रहे हैं। सपा की ओर से यह संकेत दिया गया है कि गठबंधन में सीटों की संख्या से ज्यादा महत्व उस सीट पर जीत की संभावना का होगा।
पश्चिमी यूपी में दोनों दलों के बीच राजनीतिक समीकरण इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यहां सपा और कांग्रेस की अपनी-अपनी संगठनात्मक और क्षेत्रीय मौजूदगी को लेकर अलग-अलग दावे हैं। इसी क्षेत्र में पहले भी दोनों दलों के नेताओं के बीच सार्वजनिक मंचों पर मतभेद सामने आए हैं। अगस्त में सहारनपुर की एक दिशा बैठक के दौरान इमरान मसूद और सपा विधायक आशु मलिक के बीच बोलने के समय को लेकर तीखी बहस हुई थी। बाद में मसूद ने इसे बैठक के नियमों को लेकर हुई चर्चा बताया था।
इस पूरे घटनाक्रम में इमरान मसूद और इकरा हसन की बयानबाजी को 2027 के चुनाव से पहले सपा-कांग्रेस गठबंधन में चल रही सीट शेयरिंग की बातचीत से जोड़कर देखा जा रहा है। फिलहाल दोनों दलों ने गठबंधन के साथ चुनाव लड़ने की बात कही है, लेकिन कितनी सीटों पर कौन पार्टी उम्मीदवार उतारेगी, यह तय होना बाकी है। ऐसे में आने वाले महीनों में सीटों के बंटवारे, क्षेत्रीय दावेदारी और दोनों दलों के नेताओं के बयानों पर राजनीतिक नजर बनी रहेगी।