उत्तर प्रदेश में अगले दो महीनों के दौरान राज्यसभा की 10 और विधान परिषद की 11 सीटों के लिए चुनावी प्रक्रिया होनी है। राज्यसभा की 10 सीटों पर मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को खत्म हो रहा है। इनमें बीजेपी की 8, समाजवादी पार्टी की 1 और बहुजन समाज पार्टी की 1 सीट शामिल है। ऐसे में विधानसभा के मौजूदा संख्या बल के आधार पर राजनीतिक दलों ने राज्यसभा चुनाव को लेकर अपना गणित बैठाना शुरू कर दिया है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा की कुल सदस्य संख्या 403 है, लेकिन पिछले एक साल में छह विधायकों के निधन के कारण फिलहाल प्रभावी संख्या 397 है। मौजूदा गणित के अनुसार राज्यसभा की एक सीट के लिए करीब 37 प्रथम वरीयता वाले वोटों की जरूरत होगी। राज्यसभा चुनाव में विधायक उम्मीदवारों को वरीयता के आधार पर वोट देते हैं और जरूरत पड़ने पर दूसरी वरीयता के वोटों की गिनती भी होती है।
समाजवादी पार्टी के पास फिलहाल 101 विधायक हैं। इस संख्या के आधार पर सपा दो उम्मीदवारों को आवश्यक वोट दिलाने की स्थिति में है और दो सीटें जीतने के बाद उसके पास कुछ अतिरिक्त वोट बचेंगे। वहीं बीजेपी के पास 256 विधायक बताए गए हैं। सहयोगी दलों और समर्थक विधायकों को जोड़ने के बाद एनडीए समर्थित संख्या करीब 292 तक बताई जा रही है। इस संख्या के आधार पर सात उम्मीदवारों को आवश्यक प्रथम वरीयता वोट दिलाने के बाद भी एनडीए के पास अतिरिक्त वोट बचने की संभावना है।
10वीं सीट के लिए दूसरी वरीयता के वोट अहम
यूपी की मौजूदा विधानसभा में बीजेपी के साथ उसके सहयोगी दलों की संख्या जोड़ने के अलावा कुछ निर्दलीय और अन्य समर्थक विधायक भी चुनावी गणित में महत्वपूर्ण हो सकते हैं। हालांकि, सहयोगी दलों के सभी विधायकों के रुख को लेकर राजनीतिक परिस्थितियां बदल सकती हैं। आजतक की रिपोर्ट के अनुसार, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के दो विधायकों के सपा की ओर झुकाव के चलते एनडीए के प्रभावी आंकड़े को करीब 292 माना जा रहा है।
यही अतिरिक्त वोट राज्यसभा की 10वीं सीट के समीकरण को दिलचस्प बनाते हैं। सात सीटों के लिए आवश्यक वोट निकालने के बाद एनडीए के पास बचने वाले वोटों का इस्तेमाल दूसरी वरीयता के जरिए हो सकता है। राज्यसभा चुनाव में यदि कोई उम्मीदवार पहली वरीयता के वोटों से जरूरी कोटा हासिल नहीं कर पाता, तो कम वोट पाने वाले उम्मीदवार को बाहर कर उसके मतपत्रों पर दर्ज अगली वरीयता के वोटों को शेष उम्मीदवारों में स्थानांतरित किया जाता है। इसलिए 10वीं सीट के लिए केवल पहली पसंद के वोट ही नहीं, बल्कि दूसरी वरीयता का गणित भी महत्वपूर्ण होगा।
इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी की स्थिति भी महत्वपूर्ण है। विधानसभा में बसपा का कोई मौजूदा विधायक नहीं है। पार्टी के राज्यसभा सदस्य रामजी गौतम का कार्यकाल भी नवंबर में समाप्त हो रहा है। ऐसे में मौजूदा विधानसभा संख्या बल के आधार पर बसपा के सामने राज्यसभा में अपनी सीट बनाए रखने की चुनौती है।
राज्यसभा की इन सीटों का चुनाव उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले होगा। इसी वजह से दोनों प्रमुख राजनीतिक खेमों के लिए विधायकों को एकजुट रखना और अपने समर्थक दलों के साथ तालमेल बनाए रखना अहम माना जा रहा है। 2024 के राज्यसभा चुनाव में भी उत्तर प्रदेश में क्रॉस वोटिंग हुई थी और बीजेपी ने आठ सीटें जीती थीं, जबकि सपा के दो उम्मीदवार निर्वाचित हुए थे। उस चुनाव में कई सपा विधायकों के बीजेपी उम्मीदवारों के पक्ष में वोट करने की रिपोर्ट सामने आई थी।
राज्यसभा चुनाव के साथ ही उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की 11 सीटों के लिए भी चुनावी गतिविधियां बढ़ेंगी। इन सीटों में शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की सीटें भी शामिल हैं, जहां मतदान का आधार विधानसभा के विधायकों से अलग होता है। इसलिए अक्टूबर-नवंबर के दौरान उत्तर प्रदेश में उच्च सदन की दोनों चुनावी प्रक्रियाएं अलग-अलग राजनीतिक समीकरणों को सामने ला सकती हैं।
फिलहाल उम्मीदवारों के नाम और चुनाव का आधिकारिक कार्यक्रम सामने आने के बाद तस्वीर और स्पष्ट होगी। मौजूदा संख्या बल के आधार पर एनडीए के लिए सात सीटों और सपा के लिए दो सीटों का गणित बन रहा है, जबकि बची हुई सीट के लिए अतिरिक्त वोट, दूसरी वरीयता और संभावित क्रॉस वोटिंग अहम भूमिका निभा सकते हैं।