उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस पार्टी के भीतर आंतरिक कलह और बयानबाजी का दौर एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अजय राय और पार्टी नेत्री ममता चौधरी के मध्य उत्पन्न हुआ विवाद अब सार्वजनिक मंचों और मीडिया की सुर्खियों में आ गया है। अजय राय के साथ हुए हालिया विवाद और कथित तनातनी पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए ममता चौधरी ने बहुत तीखे तेवर दिखाए हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा है कि पार्टी के भीतर जो लोग गाली-गलौज करने और जूते-चप्पल चलाने जैसी अमर्यादित हरकतों पर उतर आते हैं, वे वास्तविक अर्थों में कभी सच्चे कांग्रेसी हो ही नहीं सकते।
कांग्रेस पार्टी की आंतरिक बैठकों और सांगठनिक गतिविधियों के दौरान उपजे इस मतभेद के बाद से राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है। ममता चौधरी ने प्रदेश नेतृत्व की कार्यप्रणाली और व्यवहार पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए आरोप लगाया है कि पार्टी के भीतर वैचारिक अनुशासन और गरिमा का हनन हो रहा है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस जैसे महान इतिहास वाले संगठन में इस तरह की हिंसा और अभद्र भाषा के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए, और जो लोग ऐसा कर रहे हैं वे पार्टी की वैचारिक पृष्ठभूमि को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
दलितों और पिछड़ों की उपेक्षा का लगाया गंभीर आरोप
अपने बयानों में ममता चौधरी ने इस विवाद को केवल व्यक्तिगत मतभेद तक सीमित न रखते हुए इसे बड़े सामाजिक और वैचारिक मुद्दों से जोड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी संगठन के भीतर हमेशा से ही दलितों, शोषितों और पिछड़ों की आवाज को दबाने की प्रवृत्ति रही है और उन्हें उचित सम्मान व प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाता है। उन्होंने कहा कि जब भी कोई जमीनी नेता अपने अधिकारों और पार्टी के सिद्धांतों के लिए आवाज उठाता है, तो उसे इस प्रकार के दबाव और अपमानजनक व्यवहार का सामना करना पड़ता है।
संगठन के भीतर आंतरिक कलह से बढ़ रही है चिंता
उत्तर प्रदेश में आगामी राजनीतिक चुनौतियों का सामना करने के लिए जुटी कांग्रेस पार्टी के लिए इस तरह का आंतरिक घमासान एक बड़ा झटका माना जा रहा है। एक तरफ जहां पार्टी राज्य में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए संघर्ष कर रही है, वहीं शीर्ष स्तर के नेताओं और पदाधिकारियों के बीच इस प्रकार की सार्वजनिक बयानबाजी और खींचतान से कार्यकर्ताओं का मनोबल प्रभावित हो रहा है। ममता चौधरी के इन तीखे तेवरों के बाद अब देखना यह होगा कि केंद्रीय नेतृत्व इस मामले में क्या कदम उठाता है और राज्य इकाई इस आंतरिक असंतोष को कैसे शांत करती है।