उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव के दृष्टिगत विपक्षी इंडिया (INDIA) गठबंधन के भीतर सीटों के बंटवारे (सीट शेयरिंग) को लेकर राजनीतिक घमासान और खींचतान अत्यंत तीव्र हो गई है। समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने गठबंधन के प्रमुख सहयोगी दल कांग्रेस के समक्ष अत्यंत कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाया है। सपा प्रमुख ने स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव में केवल सीटों की संख्या अथवा बड़े दावों के आधार पर सीटों का आवंटन नहीं किया जाएगा। उन्होंने कांग्रेस के सामने ‘जीतने की क्षमता’ (विनेबिलिटी) और ‘मजबूत व समर्पित प्रत्याशी’ की अनिवार्य शर्त रखते हुए अपनी 4 प्रमुख मांगें और सिद्धांत सार्वजनिक कर दिए हैं।
अखिलेश यादव द्वारा तय की गई पहली और सबसे महत्वपूर्ण शर्त ‘जीतने की क्षमता’ (विनेबिलिटी) को बनाया गया है। सपा प्रमुख का मानना है कि किसी भी विधानसभा सीट पर प्रत्याशी का चयन करते समय केवल पार्टी के प्रभाव का आकलन नहीं किया जाएगा, अपितु यह देखा जाएगा कि संबंधित सीट पर कौन सी पार्टी भारतीय जनता पार्टी को पराजित करने में वास्तव में सक्षम है। उन्होंने संदेश दिया है कि राजनीति में सीटों की संख्या बढ़ाने से अधिक महत्वपूर्ण चुनाव जीतना है, इसलिए जिस दल का जनाधार जिस क्षेत्र में मजबूत होगा, वही वहां चुनाव लड़ेगा।
सपा की दूसरी प्रमुख मांग ‘मजबूत और स्थानीय दावेदार’ की शर्त से संबंधित है। समाजवादी पार्टी का रुख है कि कांग्रेस केवल उन्हीं सीटों पर अपनी दावेदारी प्रस्तुत करे, जहां उसके पास धरातल पर मजबूत, प्रभावशाली और जनाधार वाला प्रत्याशी उपलब्ध हो। यदि किसी सीट पर सहयोगी दल के पास कोई जनाधार वाला चेहरा मौजूद नहीं है, तो वहां महज औपचारिकता या सांकेतिक उपस्थिति दर्ज कराने के लिए सीट का समर्पण नहीं किया जाएगा। सपा का तर्क है कि कमजोर उम्मीदवार उतारने से सीधा लाभ सत्तारूढ़ दल को प्राप्त होता है, जिसे कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता।
तीसरी शर्त के अंतर्गत अखिलेश यादव ने उन विधानसभा क्षेत्रों पर अपना पूर्ण और एकाधिकार वाला दावा कायम रखा है, जहां 2022 के पिछले विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी विजयी हुए थे या फिर वे न्यूनतम अंतर से दूसरे स्थान पर (रनर-अप) रहे थे। सपा उन सभी सीटों को अपनी पारंपरिक और मजबूत जमीन मानकर चल रही है, जहां उसका संगठनात्मक ढांचा और कोर वोटबैंक अत्यधिक सक्रिय है। पार्टी के रणनीतिकारों का स्पष्ट कहना है कि अपने मजबूत आधार वाली और रनर-अप रही सीटों पर किसी भी प्रकार का समझौता अथवा बार्गेनिंग नहीं की जाएगी।
चौथी मांग के रूप में अखिलेश यादव ने कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को यह भी संकेत दिया है कि गठबंधन का मुख्य चेहरा और नेतृत्व राज्य स्तर पर समाजवादी पार्टी का ही रहेगा। सपा चाहती है कि कांग्रेस राज्य के जमीनी राजनीतिक समीकरणों, पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के सामाजिक ताने-बाने और क्षेत्रीय वास्तविकताओं को स्वीकार करते हुए व्यावहारिक रुख अपनाए। सपा का स्पष्ट मानना है कि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का मुख्य मुकाबला समाजवादी पार्टी का केडर ही कर सकता है, इसलिए सहयोगी दलों को अति-महत्वाकांक्षी मांगों से बचकर वास्तविकता के धरातल पर वार्ता करनी चाहिए।
दूसरी ओर, 2024 के आम चुनाव में मिली सफलता के पश्चात उत्तर प्रदेश कांग्रेस का मनोबल भी ऊंचा है और पार्टी लगभग 100 से अधिक सीटों पर अपनी मजबूत दावेदारी प्रस्तुत करने की योजना पर कार्य कर रही है। कांग्रेस का तर्क है कि अपने प्रभाव वाले लोकसभा क्षेत्रों के अंतर्गत आने वाली विधानसभा सीटों पर उसे प्राथमिकता दी जानी चाहिए। हालांकि, अखिलेश यादव द्वारा रखी गई इन कड़ी और व्यावहारिक शर्तों के पश्चात दोनों सहयोगी दलों के मध्य सीट शेयरिंग की वार्ता अत्यंत पेचीदा हो गई है। आने वाले दिनों में शीर्ष नेताओं के मध्य होने वाली उच्चस्तरीय बैठकों के पश्चात ही इस राजनीतिक गुत्थी के सुलझने की संभावना व्यक्त की जा रही है।