हिंदू धर्म और सनातन परंपरा में पितृ पक्ष का समय पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का अत्यंत पवित्र अवसर माना जाता है। इन 15-16 दिनों की अवधि में लोग अपने दिवंगत पूर्वजों की आत्मिक शांति और तृप्ति के लिए तर्पण, पिंडदान, श्राद्ध कर्म तथा दान-पुण्य करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सामान्य नियम यही कहता है कि जिस तिथि को किसी पूर्वज का निधन हुआ हो, पितृ पक्ष में उसी तिथि पर उनका श्राद्ध किया जाता है। हालांकि, ज्योतिषशास्त्र और धार्मिक ग्रंथों में तीन ऐसी विशेष तिथियों का वर्णन मिलता है जिनका महत्व अत्यंत खास होता है। वर्ष 2026 में 26 सितंबर से पितृ पक्ष की शुरुआत हो रही है और इस पूरे पक्ष में महाभरणी, मातृ नवमी तथा सर्वपितृ अमावस्या जैसी तिथियों पर श्राद्ध कर्म करने का विशेष फल बताया गया है।
पितृ पक्ष की विशेष तिथियों में सबसे पहला नाम भरणी श्राद्ध का आता है, जिसे कई स्थानों पर महाभरणी श्राद्ध भी कहा जाता है। भरणी नक्षत्र से जुड़े होने के कारण इस श्राद्ध का अपना अलग धार्मिक महत्व है। परंपराओं के अनुसार, परिवार में किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद एक वर्ष पूरा होने पर भरणी श्राद्ध करने का नियम माना गया है। इसके अतिरिक्त यदि किसी अविवाहित व्यक्ति का निधन हुआ हो, तो उनके लिए भी भरणी श्राद्ध करना बेहद शुभ और फलदायी माना जाता है। वर्ष 2026 में महाभरणी श्राद्ध 29 सितंबर मंगलवार को पड़ेगा, जिस दिन परिजनों द्वारा तर्पण और श्राद्ध कर्म किया जाएगा।
दूसरी अत्यंत महत्वपूर्ण तिथि मातृ नवमी की मानी जाती है, जिसे मातृ श्राद्ध भी कहा जाता है। यह दिन विशेष रूप से परिवार की दिवंगत महिलाओं, जैसे मां, दादी, नानी या अन्य पूजनीय महिला पूर्वजों की स्मृति और शांति के लिए समर्पित होता है। यदि किसी परिवार में दिवंगत महिला पूर्वज की मृत्यु तिथि को लेकर स्पष्ट जानकारी उपलब्ध न हो, तो धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नवमी तिथि के दिन उनके निमित्त तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन कराना उत्तम रहता है। साल 2026 में मातृ नवमी का श्राद्ध 4 अक्टूबर रविवार के दिन किया जाएगा।
पितृ पक्ष की सभी तिथियों में सबसे प्रमुख और अंतिम तिथि सर्वपितृ अमावस्या होती है, जिसे महालय अमावस्या भी कहा जाता है। यह दिन पितृ पक्ष का समापन दिवस होता है और इसका महत्व इसलिए सबसे अधिक है क्योंकि इस दिन उन सभी पितरों के लिए श्राद्ध किया जा सकता है जिनकी मृत्यु तिथि परिवार को मालूम नहीं है। इसके अलावा यदि किसी कारणवश किसी पूर्वज का उनके निश्चित दिन पर श्राद्ध नहीं हो पाया हो, तो सर्वपितृ अमावस्या पर उनके नाम का तर्पण और दान करके उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है। वर्ष 2026 में सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर शनिवार को पड़ेगी।
इसके अलावा पूरे पितृ पक्ष 2026 का कैलेंडर देखें तो 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध, 27 सितंबर को प्रतिपदा, 28 सितंबर को द्वितीया, 29 सितंबर को तृतीया व महाभरणी, 30 सितंबर को चतुर्थी व पंचमी, 1 अक्टूबर को षष्ठी, 2 अक्टूबर को सप्तमी, 3 अक्टूबर को अष्टमी, 4 अक्टूबर को मातृ नवमी, 5 अक्टूबर को दशमी, 6 अक्टूबर को एकादशी, 7 अक्टूबर को द्वादशी व मघा, 8 अक्टूबर को त्रयोदशी, 9 अक्टूबर को चतुर्दशी और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध किया जाएगा। धार्मिक विद्वानों के अनुसार यदि किसी को मृत्यु तिथि याद न हो तो चिंता करने के बजाय सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्रद्धापूर्वक किया गया श्राद्ध भी पितरों तक पहुंच जाता है।