भारत के युवा निशानेबाज पार्थ माने ने एशियन गेम्स 2026 में 10 मीटर एयर राइफल पुरुष टीम स्पर्धा में रजत पदक जीतकर अपने अंतरराष्ट्रीय करियर की बड़ी उपलब्धि दर्ज की। रुद्रांक्ष पाटिल और हिमांशु ढिल्लों के साथ भारतीय टीम ने 1890.1 अंक हासिल कर दूसरा स्थान हासिल किया, जबकि चीन ने 1899.0 अंकों के साथ स्वर्ण पदक जीता। इसके बाद मंगलवार को पार्थ माने और एलावेनिल वलारिवान की जोड़ी 10 मीटर एयर राइफल मिश्रित टीम स्पर्धा के फाइनल में चौथे स्थान पर रही। क्वालिफिकेशन में भारतीय जोड़ी ने 634.6 अंक बनाए थे, जो चीन के 638.9 अंकों के विश्व रिकॉर्ड के बाद दूसरा सर्वश्रेष्ठ स्कोर था।
18 वर्षीय पार्थ की इस उपलब्धि के पीछे सिर्फ उनकी प्रतिभा नहीं, बल्कि कई वर्षों की मेहनत, लगातार बदलावों को स्वीकार करने की क्षमता और परिवार तथा कोच का साथ भी रहा है। उनके कोच और पूर्व राष्ट्रीय राइफल कोच सुमां शिरूर के मुताबिक पार्थ की सबसे बड़ी खूबियों में से एक उनका बेहद ‘कोचेबल’ होना है। यानी वह कोच की सलाह को सुनते हैं, उसे समझते हैं और जरूरत पड़ने पर अपनी तकनीक में बदलाव करने के लिए तैयार रहते हैं।
पार्थ ने महज 13 साल की उम्र में शूटिंग शुरू की थी। महाराष्ट्र के सोलापुर में एक स्थानीय शूटिंग रेंज में आयोजित समर वर्कशॉप के दौरान उनके पिता राकेश माने ने उन्हें इस खेल से परिचित कराया। राकेश महाराष्ट्र के अपराध जांच विभाग में अधिकारी हैं और चाहते थे कि उनका बेटा किसी खेल को जरूर अपनाए। पार्थ ने शूटिंग को चुना और कुछ ही समय में यह शौक गंभीर प्रशिक्षण में बदल गया।
बेहतर प्रशिक्षण के लिए पार्थ के पिता ने उन्हें सोलापुर से पुणे भेजना शुरू किया। दोनों शहरों के बीच करीब 250 किलोमीटर की दूरी थी। लॉकडाउन के दौरान जब यात्रा और प्रशिक्षण मुश्किल हो गया तो परिवार ने घर पर ही एक अस्थायी शूटिंग रेंज तैयार कर ली। पार्थ वीडियो कॉल के जरिए पुणे में मौजूद अपने कोच से जुड़े रहते और अभ्यास करते रहे। हालात सामान्य होने पर वह हर महीने करीब 10 दिन पुणे जाकर प्रशिक्षण लेते थे और बाकी समय घर पर अभ्यास करते थे। इस तरह कई महीनों तक उनका जीवन लगातार यात्रा और प्रशिक्षण के बीच चलता रहा।
कोचिंग के लिए बदला शहर, बदली पूरी ट्रेनिंग व्यवस्था
पार्थ के पिता को महसूस हुआ कि सोलापुर और पुणे के बीच लगातार आना-जाना लंबे समय तक संभव नहीं है। इसके बाद उन्होंने अपने विभाग में तबादले के लिए आवेदन किया और पुणे तथा मुंबई को अपनी प्राथमिकता के तौर पर चुना। आखिरकार उनका तबादला नवी मुंबई के पनवेल में हो गया। खास बात यह रही कि पनवेल में ही सुमां शिरूर का लक्ष्य शूटिंग क्लब स्थित था। इस बदलाव ने पार्थ के प्रशिक्षण को नियमित और व्यवस्थित करने में बड़ी भूमिका निभाई।
सुमां शिरूर ने पार्थ को तब देखा था जब वह सिर्फ 13 साल के थे। उनके मुताबिक इतनी कम उम्र में किसी खिलाड़ी से मिलने पर लक्ष्य सिर्फ तत्काल परिणाम हासिल करना नहीं होता, बल्कि लंबे समय के लिए खिलाड़ी को तैयार करना होता है। पार्थ के मामले में भी यही तरीका अपनाया गया। 2024 में उन्होंने जूनियर विश्व चैंपियनशिप का खिताब जीता और अब एशियन गेम्स के अपने पदार्पण में टीम रजत पदक तक पहुंच गए हैं।
पार्थ के करियर में शारीरिक विकास के साथ तकनीकी बदलाव भी महत्वपूर्ण रहे। जूनियर स्तर पर विश्व खिताब जीतने के बाद उनके शरीर में बदलाव हो रहा था, जिसकी वजह से शूटिंग के दौरान शरीर के सही एलाइनमेंट को लेकर समस्या आ रही थी। इसे सुधारने के लिए तकनीक और शारीरिक स्थिति में बदलाव किया गया। इस बदलाव का असर कुछ समय तक प्रदर्शन पर पड़ा और करीब तीन महीने तक पार्थ के नतीजों में गिरावट आई। लेकिन उन्होंने बदलाव को छोड़ने के बजाय उस पर काम जारी रखा। इसके बाद उनके प्रदर्शन में दोबारा सुधार दिखाई देने लगा।
उनके पिता राकेश माने के मुताबिक पार्थ बचपन से ही अपने फैसलों को लेकर स्पष्ट रहे हैं। परिवार ने उन्हें अलग-अलग लोगों की राय से भ्रमित होने के बजाय अपने फैसलों की जिम्मेदारी लेने के लिए प्रोत्साहित किया। यही वजह है कि कम उम्र में ही पार्थ ईमेल के जरिए आधिकारिक संवाद तक खुद संभालने लगे थे।
एशियन गेम्स में रजत पदक जीतना पार्थ के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। हालांकि मिश्रित टीम स्पर्धा में एलावेनिल वलारिवान के साथ भारत चौथे स्थान पर रहा। दोनों ने क्वालिफिकेशन में शानदार प्रदर्शन किया, लेकिन चार टीमों के फाइनल में भारत की शुरुआत अपेक्षाकृत धीमी रही। जापान और दक्षिण कोरिया ने शुरुआती बढ़त बनाई और भारतीय जोड़ी अंत तक उस अंतर को पाट नहीं सकी। भारत 376.3 अंकों के साथ चौथे स्थान पर रहा।
फिलहाल पार्थ पनवेल स्थित अपने परिवार से अलग लक्ष्य शूटिंग क्लब की नई आवासीय व्यवस्था में रहकर प्रशिक्षण ले रहे हैं। इस केंद्र को आगे हाई परफॉर्मेंस सेंटर के रूप में विकसित करने की योजना है। राष्ट्रीय टीम का प्रतिस्पर्धी माहौल भी उनके विकास का हिस्सा है, जहां उन्हें तकनीक के साथ दबाव में प्रदर्शन करने का अनुभव हासिल करने का मौका मिल रहा है।
सोलापुर में शुरू हुई शूटिंग से लेकर पुणे की यात्राओं, लॉकडाउन के दौरान घर पर बनाए गए अस्थायी अभ्यास केंद्र और फिर नवी मुंबई में स्थायी प्रशिक्षण व्यवस्था तक पार्थ माने का सफर यह दिखाता है कि एक युवा खिलाड़ी का विकास सिर्फ मैदान या शूटिंग रेंज में नहीं होता। परिवार के फैसले, कोच पर भरोसा, लगातार बदलावों को स्वीकार करने की क्षमता और लंबे समय तक अभ्यास जारी रखने की तैयारी ने उनके अब तक के सफर को आकार दिया है। एशियन गेम्स में मिला रजत पदक इसी लंबी प्रक्रिया का एक अहम पड़ाव है।