अगर परिवार में किसी माता-पिता या करीबी रिश्तेदार को अल्जाइमर हुआ है, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि क्या यह बीमारी अगली पीढ़ी में भी हो सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक अल्जाइमर का संबंध आनुवंशिकता से जरूर है, लेकिन ज्यादातर मामलों में किसी एक जीन की मौजूदगी बीमारी होने की गारंटी नहीं देती। उम्र, जीवनशैली और अन्य स्वास्थ्य संबंधी कारक भी इसके जोखिम को प्रभावित करते हैं।
अल्जाइमर के मामलों का एक बहुत छोटा हिस्सा सीधे विरासत में मिलने वाले आनुवंशिक बदलावों से जुड़ा होता है। हिन्दुस्तान टाइम्स से बातचीत में विशेषज्ञों ने बताया कि दुर्लभ पारिवारिक मामलों में एपीपी, पीएसईएन1 और पीएसईएन2 जैसे जीन में बदलाव बीमारी का कारण बन सकते हैं। ऐसे मामले अक्सर कम उम्र में शुरू होते हैं और परिवार की कई पीढ़ियों में दिखाई दे सकते हैं। अल्जाइमर एसोसिएशन के अनुसार, इस तरह का निर्णायक आनुवंशिक अल्जाइमर कुल मामलों के करीब 1 प्रतिशत या उससे भी कम हिस्से में होता है।
एपीओई-ई4 जीन बढ़ाता है जोखिम, लेकिन बीमारी की गारंटी नहीं
अल्जाइमर से जुड़े आनुवंशिक जोखिम की चर्चा में एपीओई जीन का नाम सबसे ज्यादा सामने आता है। इसका ई4 प्रकार देर से शुरू होने वाले अल्जाइमर के जोखिम को बढ़ा सकता है। किसी व्यक्ति में एपीओई-ई4 की एक प्रति होने पर जोखिम बढ़ सकता है और दो प्रतियां होने पर जोखिम और बढ़ जाता है। हालांकि विशेषज्ञ स्पष्ट करते हैं कि एपीओई-ई4 को बीमारी की भविष्यवाणी करने वाला निश्चित परीक्षण नहीं माना जा सकता।
इसका मतलब यह भी है कि अगर किसी व्यक्ति में एपीओई-ई4 नहीं है तो वह अल्जाइमर से पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। इसी तरह एपीओई-ई4 मौजूद होने का अर्थ यह नहीं है कि भविष्य में उस व्यक्ति को अल्जाइमर निश्चित रूप से होगा। परिवार में माता-पिता या भाई-बहन को अल्जाइमर होने से जोखिम बढ़ सकता है, लेकिन बीमारी विकसित होने में उम्र, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, नींद, धूम्रपान और अन्य स्वास्थ्य व जीवनशैली संबंधी कारकों की भी भूमिका रहती है।
परिवार में अल्जाइमर का इतिहास होने मात्र से हर व्यक्ति को जेनेटिक टेस्ट कराने की जरूरत नहीं मानी जाती। विशेषज्ञों के अनुसार बिना लक्षण वाले व्यक्ति में एपीओई टेस्ट का परिणाम कई बार चिंता बढ़ा सकता है, जबकि यह निश्चित रूप से नहीं बता सकता कि व्यक्ति को भविष्य में बीमारी होगी या नहीं। इसलिए ऐसे परीक्षण का फैसला डॉक्टर या जेनेटिक काउंसलर से सलाह के बाद करना अधिक उचित माना जाता है।
हालांकि कुछ परिस्थितियों में एपीओई की जानकारी इलाज की योजना बनाने में उपयोगी हो सकती है। खासकर शुरुआती अल्जाइमर के कुछ मरीजों में इस्तेमाल होने वाली एंटी-एमिलॉयड दवाओं के मामले में एपीओई-ई4 की स्थिति उपचार से जुड़े कुछ जोखिमों का आकलन करने में मदद कर सकती है। इसलिए आज जेनेटिक जानकारी का इस्तेमाल केवल भविष्य में बीमारी होगी या नहीं जानने तक सीमित नहीं है, बल्कि कुछ मरीजों के उपचार संबंधी निर्णयों में भी इसकी भूमिका हो सकती है।
अगर परिवार में कई करीबी रिश्तेदारों को कम उम्र में अल्जाइमर हुआ हो, खासकर अलग-अलग पीढ़ियों में बीमारी का पैटर्न दिखाई देता हो, तो विशेषज्ञ से जेनेटिक काउंसलिंग के बारे में चर्चा की जा सकती है। ऐसे मामलों में डॉक्टर परिवार के इतिहास, बीमारी शुरू होने की उम्र और अन्य उपलब्ध मेडिकल जानकारी के आधार पर तय कर सकते हैं कि जेनेटिक जांच उपयोगी होगी या नहीं।
अल्जाइमर के जोखिम में उम्र सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक है। हिन्दुस्तान टाइम्स से बातचीत में विशेषज्ञों ने बताया कि 65 वर्ष की उम्र के बाद अल्जाइमर का जोखिम लगभग हर पांच साल में बढ़ता है। इसी कारण उम्र बढ़ने के साथ याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता में होने वाले बदलावों को केवल सामान्य बुढ़ापे का हिस्सा मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
अच्छी बात यह है कि ऐसे कई कारक हैं जिन पर व्यक्ति काम कर सकता है। नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद, संतुलित आहार, रक्तचाप, मधुमेह और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखना, धूम्रपान से बचना, सामाजिक रूप से सक्रिय रहना और मानसिक गतिविधियों में भाग लेना मस्तिष्क के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2026 की मार्गदर्शिका से जुड़े आंकड़ों का हवाला देते हुए विशेषज्ञों ने बताया कि डिमेंशिया के जोखिम का एक बड़ा हिस्सा ऐसे कारकों से जुड़ा हो सकता है जिन्हें बदला जा सकता है।
अल्जाइमर की जांच भी अब केवल जेनेटिक टेस्ट तक सीमित नहीं है। डॉक्टर मरीज की मेडिकल हिस्ट्री, याददाश्त और व्यवहार में बदलाव, न्यूरोलॉजिकल और कॉग्निटिव जांच तथा जरूरत के अनुसार ब्रेन इमेजिंग और रक्त या अन्य जैविक नमूनों से होने वाली जांचों को मिलाकर निदान करते हैं। अल्जाइमर एसोसिएशन के मुताबिक किसी एक टेस्ट से अकेले अल्जाइमर का निश्चित निदान नहीं किया जाता।
इसलिए परिवार में किसी को अल्जाइमर होने का मतलब यह नहीं है कि बीमारी अगली पीढ़ी में निश्चित रूप से आएगी। परिवार का मेडिकल इतिहास डॉक्टर को जोखिम समझने में मदद कर सकता है, लेकिन व्यक्तिगत जोखिम का आकलन उम्र, लक्षणों, स्वास्थ्य स्थिति, पारिवारिक इतिहास और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ जांच को साथ रखकर किया जाना चाहिए। बिना चिकित्सकीय सलाह के सीधे उपभोक्ता डीएनए किट से जेनेटिक टेस्ट कराने के बजाय डॉक्टर या जेनेटिक काउंसलर से चर्चा करना बेहतर है।