टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस में एन. चंद्रशेखरन की दोबारा चेयरमैन नियुक्ति को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने इस नियुक्ति की प्रक्रिया और बोर्ड वोट पर गंभीर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि 2022 में चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के लिए जिस प्रावधान का इस्तेमाल किया गया था, उससे अलग प्रक्रिया 2026 में अपनाई गई। नोएल टाटा ने दावा किया है कि यह प्रक्रिया टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के अनुरूप नहीं थी।
17 सितंबर 2026 को हुई टाटा संस की बोर्ड बैठक में चंद्रशेखरन को अगले पांच वर्षों के लिए चेयरमैन बनाए रखने का फैसला लिया गया। बैठक करीब चार घंटे चली और इस दौरान नियुक्ति को लेकर मतभेद सामने आए। टाटा ट्रस्ट्स के नामित निदेशक नोएल टाटा और वेंु श्रीनिवासन ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। इसके बाद बोर्ड की प्रक्रिया की अध्यक्षता कर रहे हरीश मनवानी ने निर्णायक वोट दिया, जिसके बाद चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के पक्ष में फैसला हुआ।
नोएल टाटा ने इसके बाद टाटा संस के ग्रुप कंपनी सेक्रेटरी सुप्रकाश मुखोपाध्याय को दो पत्र भेजे। इनमें उन्होंने बोर्ड की कार्रवाई पर गंभीर निराशा और कड़ी आपत्ति जताई। नोएल का कहना है कि बोर्ड के सदस्यों के बीच यह सहमति बनी थी कि कानूनी राय मिलने और चंद्रशेखरन के निदेशक पद पर पुनर्नियुक्ति को लेकर जरूरी प्रक्रिया पूरी होने से पहले इस मामले की सार्वजनिक घोषणा नहीं की जाएगी। उनके अनुसार इसके बावजूद टाटा संस की ओर से बोर्ड के फैसले की घोषणा कर दी गई।
2022 और 2026 में अलग-अलग नियम अपनाने का दावा
विवाद के केंद्र में टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के आर्टिकल 118 और आर्टिकल 121 हैं। नोएल टाटा के अनुसार आर्टिकल 118 चेयरमैन के चयन से संबंधित है, जबकि आर्टिकल 121 व्यापक रणनीतिक मामलों से जुड़ा प्रावधान है। उनका दावा है कि 2022 में चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति आर्टिकल 118 के तहत हुई थी, जबकि 2026 में बोर्ड ने आर्टिकल 121 के आधार पर प्रक्रिया आगे बढ़ाई।
नोएल टाटा ने अपने पत्र में 11 फरवरी 2022 की बोर्ड बैठक के मिनट्स भी संलग्न किए। उनका कहना है कि इन मिनट्स से यह स्पष्ट होता है कि पिछली बार चेयरमैन की पुनर्नियुक्ति आर्टिकल 118 के तहत की गई थी। इसी आधार पर उन्होंने 17 सितंबर 2026 की बैठक में भी आर्टिकल 118 को लागू करने की बात रखी थी। नोएल का आरोप है कि उनकी आपत्ति के बावजूद बोर्ड ने अलग प्रावधान के तहत प्रक्रिया आगे बढ़ाई।
नोएल ने अपने पत्र में यह भी कहा कि बोर्ड ने इस मामले में कानूनी राय लेने पर सहमति जताई थी। उनके अनुसार कानूनी राय में यह स्पष्ट किया जाना था कि चेयरमैन की पुनर्नियुक्ति के लिए आर्टिकल 118 लागू होता है या नहीं, क्या नोएल के विरोध के बावजूद नियुक्ति को मंजूरी दी जा सकती है और बराबरी की स्थिति में बोर्ड के चेयरमैन का निर्णायक वोट मान्य होगा या नहीं।
इस दौरान नोएल टाटा की ओर से भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की कानूनी राय भी बोर्ड के सामने रखी गई थी। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, इस राय में कहा गया था कि टाटा संस के चेयरमैन का चुनाव करने के लिए ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों के बहुमत का समर्थन आवश्यक है। हालांकि बोर्ड ने इस राय पर विचार नहीं किया और एक अन्य वकील सुदीप्तो सरकार की राय का सहारा लिया।
टाटा संस के बोर्ड में चंद्रशेखरन, नोएल टाटा और वेंु श्रीनिवासन के अलावा ग्रुप के मुख्य वित्तीय अधिकारी सौरभ अग्रवाल तथा स्वतंत्र निदेशक हरीश मनवानी और अनिता मरांगोली जॉर्ज शामिल हैं। मौजूदा विवाद में खास तौर पर टाटा ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों के वोट और निर्णायक वोट के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठे हैं।
टाटा ट्रस्ट्स ने भी 20 सितंबर को चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को लेकर अपनी आपत्ति सार्वजनिक की। ट्रस्ट्स का कहना है कि उनके दोनों नामित निदेशकों का समर्थन आवश्यक था और केवल निर्णायक वोट के जरिए इस शर्त को पूरा नहीं किया जा सकता। टाटा ट्रस्ट्स की हिस्सेदारी टाटा संस में करीब 66 प्रतिशत बताई जाती है।
टाटा ट्रस्ट्स ने यह भी कहा कि दोनों नामित निदेशकों ने एक ही राय में वोट नहीं किया था, इसलिए उनके मुताबिक यह स्थिति सामान्य अर्थों में बराबरी का मामला नहीं थी जिसे निर्णायक वोट से हल किया जा सके। दूसरी ओर, टाटा संस के बोर्ड ने बहुमत के आधार पर चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति का फैसला घोषित किया है। इस तरह दोनों पक्षों के बीच टाटा संस के आंतरिक नियमों की व्याख्या को लेकर मतभेद सामने आया है।
विवाद का एक दूसरा पहलू यह भी है कि चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के बाद टाटा संस के भविष्य को लेकर पहले से चल रहे मतभेद भी चर्चा में हैं। इनमें कंपनी की संभावित सार्वजनिक लिस्टिंग और टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका जैसे मुद्दे शामिल हैं। रॉयटर्स के अनुसार, टाटा ट्रस्ट्स टाटा संस में करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है और कंपनी की सार्वजनिक लिस्टिंग को लेकर दोनों पक्षों में मतभेद रहे हैं।
फिलहाल चंद्रशेखरन की पांच साल की नई अवधि को लेकर टाटा संस बोर्ड का फैसला सामने है, लेकिन नोएल टाटा और टाटा ट्रस्ट्स की कानूनी वैधता संबंधी आपत्तियों ने मामले को विवादित बना दिया है। आगे इस विवाद में बोर्ड, शेयरधारकों और संभावित कानूनी प्रक्रियाओं के स्तर पर क्या कदम उठते हैं, इस पर टाटा समूह के भीतर और कारोबारी जगत की नजर रहेगी।