राजस्थान निकाय चुनाव 2026 के नतीजों में इस बार स्थानीय मुद्दों के साथ यूजीसी के प्रस्तावित जाति आधारित नियमों को लेकर अगड़ी जातियों, खासकर राजपूत समाज के एक हिस्से की नाराजगी का असर देखने को मिलने का दावा किया जा रहा है। बीजेपी का परंपरागत अगड़ी जाति के समाज के बीच यूजीसी के मुद्दे को लेकर चुनाव से पहले विरोध-प्रदर्शन हुए थे। नतीजों में कई राजपूत बहुल और बीजेपी के मजबूत माने जाने वाले इलाकों में निर्दलीय उम्मीदवारों के प्रदर्शन ने पार्टी की चिंता बढ़ाई है।
हालांकि बीजेपी के लिए राहत की बात यह रही कि नाराज वोटरों का बड़ा हिस्सा कांग्रेस की तरफ जाता हुआ नहीं दिखा। कई जगह निर्दलीयों को समर्थन मिला, जबकि NOTA का विकल्प भी चुना गया। ऐसे में बीजेपी को नुकसान तो हुआ, लेकिन इसका पूरा फायदा कांग्रेस नहीं उठा सकी।
झालावाड़ से जोधपुर तक दिखे बदले समीकरण
बीजेपी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसुंधरा राजे के प्रभाव वाले झालावाड़ में कांग्रेस की जीत ने पार्टी को झटका दिया है। वहीं केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के जोधपुर में मुकाबला बराबरी पर अटक गया और बोर्ड बनाने में निर्दलीयों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी के विद्याधर नगर क्षेत्र में भी बीजेपी के प्रदर्शन में गिरावट दर्ज की गई। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक यहां बीजेपी के जीते वार्डों का अनुपात करीब 64.3 फीसदी से घटकर 60 फीसदी रह गया, जबकि करीब 20 फीसदी वार्ड निर्दलीयों के खाते में गए।
उद्योग मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ के झोटवाड़ा क्षेत्र में बीजेपी का वार्ड शेयर करीब 63 फीसदी से घटकर 53 फीसदी रह गया। यहां करीब 23 फीसदी वार्ड निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीते।
करणी सेना ने बताया BJP के लिए ‘चेतावनी’
यूजीसी के मुद्दे पर राज्यभर में आंदोलन कर रही करणी सेना ने चुनाव परिणामों को बीजेपी के लिए चेतावनी बताया है। करणी सेना के अध्यक्ष महिपाल सिंह मकराना का दावा है कि अगर प्रस्तावित नियम वापस नहीं लिए गए तो बीजेपी को आगे और गंभीर राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
मकराना ने दावा किया कि जयपुर में ऐसे 21 उम्मीदवारों को संगठन ने समर्थन दिया, जिन्होंने यूजीसी से जुड़े प्रस्ताव का विरोध करने की बात लिखित रूप में दी थी। संगठन का दावा है कि अन्य जगहों पर भी उसने कई निर्दलीय उम्मीदवारों का समर्थन किया।
कांग्रेस को क्यों नहीं मिला नाराजगी का पूरा फायदा?
नतीजों का एक दिलचस्प पहलू यह है कि बीजेपी से नाराज बताए जा रहे वोटरों ने कई क्षेत्रों में कांग्रेस को विकल्प बनाने के बजाय निर्दलीय उम्मीदवारों का रुख किया। यही वजह रही कि बीजेपी के परंपरागत गढ़ों में निर्दलीयों की मौजूदगी बढ़ने के बावजूद कांग्रेस इस नाराजगी को पूरी तरह अपने पक्ष में नहीं कर सकी।
राजस्थान में बीजेपी के कई राजपूत नेताओं की तुलना में कांग्रेस नेता प्रताप सिंह खाचरियावास यूजीसी से जुड़े जाति आधारित प्रावधानों के विरोध में मुखर रहे हैं। उनके प्रभाव वाले जयपुर के सिविल लाइंस इलाके में बीजेपी और कांग्रेस के बीच मुकाबला बराबरी का रहा और दोनों दलों को करीब आधे-आधे वार्ड मिले। यहां निर्दलीय उम्मीदवार जीत दर्ज नहीं कर सके।
निकाय चुनाव के इन नतीजों के बाद बीजेपी के भीतर भी यूजीसी के मुद्दे को लेकर आवाजें तेज होने लगी हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या स्थानीय निकाय चुनाव में निर्दलीयों की बढ़ी ताकत केवल स्थानीय समीकरणों का नतीजा है या फिर यह बीजेपी के परंपरागत वोट बैंक में उभर रही नाराजगी का शुरुआती संकेत है।
वोट प्रतिशत का तुलनात्मक आंकड़ा
2021 में भाजपा का वोट शेयर 35.11 प्रतिशत था, कांग्रेस का 40.30 प्रतिशत और निर्दलीय का 24.59 प्रतिशत। 2026 में भाजपा 36.11 प्रतिशत पर पहुंची, कांग्रेस 35.14 प्रतिशत पर सिमट गई और निर्दलीय का हिस्सा 27.75 प्रतिशत हो गया। भाजपा की मामूली बढ़त 1 प्रतिशत रही, जबकि कांग्रेस 5.16 प्रतिशत पीछे हुई और निर्दलीय व नोटा की बढ़त 3.16 प्रतिशत दर्ज की गई।
बीजेपी में भी इस मामले पर अब डैमेज कंट्रोल शुरू हो गया है। भीलवाड़ा में जैनमुनि पुलक सागर जी ने दावा किया है कि सोमवार को उनसे मिलने आए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत से इस मामले पर विरोध जताया तो मोहन भागवत ने इसे लागू नहीं होने की बात कही है।
करणी सेना ने पंचायत चुनाव से पहले अपने आंदोलन को तेज करने की चेतावनी दी है। दूसरी तरफ बीजेपी पर यूजीसी के जातिगत कानून को लेकर फैसला लेने का दबाव बढ़ सकता है।