भारत की मेजबानी में नई दिल्ली में होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में काफी चर्चा है। अमेरिका और पश्चिमी देशों के मीडिया में ब्रिक्स को तेजी से बढ़ते ऐसे समूह के रूप में देखा जा रहा है, जो वैश्विक व्यवस्था में अमेरिकी प्रभाव और डॉलर के दबदबे को चुनौती देने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, साथ ही ब्रिक्स के भीतर मौजूद मतभेदों को भी प्रमुखता से रेखांकित किया जा रहा है।
अमेरिकी और पश्चिमी विश्लेषण में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ब्रिक्स एक मजबूत और एकजुट वैश्विक शक्ति बन सकता है? एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, समूह में अब 11 सदस्य देश हैं और ये दुनिया की लगभग आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन यूक्रेन, पश्चिम एशिया, ईरान और अमेरिका-चीन संबंधों जैसे मुद्दों पर सदस्य देशों के अलग-अलग हित होने के कारण एक साझा रणनीति बनाना चुनौतीपूर्ण है।
अमेरिकी नजरिए से ब्रिक्स का एक महत्वपूर्ण पहलू डॉलर पर निर्भरता कम करने की कोशिश भी है। पश्चिमी मीडिया में इस बात पर चर्चा हो रही है कि ब्रिक्स के कई देश स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और स्वतंत्र भुगतान प्रणालियों को बढ़ावा देना चाहते हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि सदस्य देशों की अलग-अलग आर्थिक व्यवस्थाओं और हितों के कारण डॉलर के विकल्प को तेजी से स्थापित करना आसान नहीं होगा।
भारत के लिए यह सम्मेलन इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि नई दिल्ली को एक तरफ रूस और चीन के साथ संबंधों को संभालना है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी भी बनाए रखनी है। एसोसिएटेड प्रेस ने भारत की इस संतुलन साधने की कोशिश को सम्मेलन के प्रमुख पहलुओं में शामिल किया है।
पाकिस्तान के मीडिया में भी दिल्ली में हो रहे ब्रिक्स सम्मेलन को भारत की बढ़ती कूटनीतिक भूमिका के संदर्भ में देखा जा रहा है। खासतौर पर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी संभावित मुलाकात को काफी महत्व दिया जा रहा है। चीन के विदेश मंत्रालय ने भी पुष्टि की है कि दोनों देशों के बीच बैठक की तैयारी चल रही है।
शी जिनपिंग की भारत यात्रा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह कई वर्षों बाद भारत पहुंचे हैं। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद, व्यापार और द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने की कोशिशों के बीच दोनों नेताओं की बातचीत पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया की नजर है। ऐसे में ब्रिक्स सम्मेलन भारत-चीन संबंधों के लिए भी एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक मंच बन गया है।
ब्रिक्स के विस्तार के साथ संगठन की ताकत बढ़ी है, लेकिन इसके साथ चुनौतियां भी बढ़ी हैं। चीन और भारत के बीच प्रतिस्पर्धा, रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया का संघर्ष और अमेरिका के साथ अलग-अलग सदस्य देशों के रिश्ते ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर समूह के भीतर पूरी सहमति बनाना मुश्किल है। फाइनेंशियल टाइम्स ने भी ब्रिक्स की बढ़ती आर्थिक और राजनीतिक ताकत के साथ उसके आंतरिक मतभेदों को बड़ी चुनौती बताया है।
इस बीच भारत की कोशिश है कि ब्रिक्स को केवल किसी देश या समूह के विरोध के मंच के तौर पर नहीं, बल्कि वैश्विक दक्षिण, आर्थिक सहयोग, तकनीकी विकास और बहुपक्षीय व्यवस्था के लिए एक प्रभावी मंच के रूप में प्रस्तुत किया जाए। भारत की अध्यक्षता में आयोजित सम्मेलन में आर्थिक सहयोग, आपूर्ति शृंखला, डिजिटल तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वित्तीय सहयोग जैसे मुद्दे भी प्रमुख एजेंडे में हैं।
कुल मिलाकर, अमेरिका और पश्चिमी मीडिया की नजर में दिल्ली का ब्रिक्स सम्मेलन इस बात की परीक्षा है कि बढ़ता हुआ यह समूह वास्तविक वैश्विक प्रभाव पैदा कर सकता है या केवल अलग-अलग देशों की महत्वाकांक्षाओं का मंच बनकर रह जाएगा। वहीं पाकिस्तान सहित पड़ोसी देशों की नजर भारत की बढ़ती कूटनीतिक भूमिका और चीन के साथ उसके संबंधों पर है। सम्मेलन में नरेंद्र मोदी, शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन जैसे नेताओं की मौजूदगी इसे और महत्वपूर्ण बना रही है।