महिला आरक्षण कानून (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) को लेकर सवाल उठ रहा है कि इसे मौजूदा 543 सदस्यों वाली लोकसभा में क्यों नहीं लागू किया जा सकता।
सरकार और विपक्ष दोनों पक्ष इस मुद्दे पर अपनी-अपनी बात रख रहे हैं। मुख्य विवाद OBC महिलाओं के लिए सब-कोटा और मौजूदा सदन में सीटें घटाने-बढ़ाने को लेकर है।
मुख्य बातें:
- महिला आरक्षण बिल मौजूदा लोकसभा में लागू करने पर विवाद
- सरकार का कहना है कि बिना जनगणना और परिसीमन के इसे लागू करना मुश्किल
- विपक्ष (खासकर कांग्रेस) OBC महिलाओं के लिए 33% सब-कोटा की मांग कर रहा है
- OBC आरक्षण का सवाल अभी भी अनसुलझा बना हुआ है
सरकार का तर्क केंद्र सरकार का कहना है कि महिला आरक्षण बिल को लागू करने के लिए पहले देशव्यापी जनगणना और उसके बाद परिसीमन (delimitation) जरूरी है। बिना परिसीमन के मौजूदा 543 सीटों में आरक्षण लागू करना संवैधानिक रूप से जटिल है। सरकार ने स्पष्ट किया कि बिल 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले लागू करने की तैयारी चल रही है।
विपक्ष का पक्ष कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल कह रहे हैं कि सरकार जानबूझकर देरी कर रही है। उन्होंने मांग की है कि OBC, SC और ST महिलाओं के लिए अलग से 33% सब-कोटा तुरंत सुनिश्चित किया जाए। गौरव गोगोई और अन्य नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार महिला आरक्षण को सिर्फ राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल कर रही है।
OBC सवाल क्यों बाकी? मुख्य विवाद OBC महिलाओं के आरक्षण को लेकर है। विपक्ष चाहता है कि OBC महिलाओं को भी बिल में स्पष्ट आरक्षण मिले, जबकि सरकार कह रही है कि OBC आरक्षण राज्य स्तर पर तय होता है और इसे केंद्र स्तर पर अलग से लागू करना जटिल है। इस मुद्दे पर अभी सहमति नहीं बन पाई है।
आगे क्या? सरकार जल्द ही महिला आरक्षण की अधिसूचना जारी करने की तैयारी में है, लेकिन परिसीमन और जनगणना पूरी होने तक इसका पूरा क्रियान्वयन टल सकता है। विपक्ष लगातार दबाव बना रहा है कि बिल को और समावेशी बनाया जाए।