भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा शुरू किए गए मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान को लेकर देश भर में उपजा जनाक्रोश अब एक राष्ट्रव्यापी राजनीतिक आंदोलन का रूप धारण कर चुका है। बीते 10 दिनों के भीतर देश के 26 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विपक्षी दलों, सामाजिक संगठनों और नागरिक मंचों द्वारा कुल 278 छोटे-बड़े विरोध प्रदर्शन आयोजित किए जा चुके हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के तत्काल त्यागपत्र और SIR प्रक्रिया को वापस लेने की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर पटना के राजभवन तथा बेंगलुरु के फ्रीडम पार्क तक जन-आंदोलन का व्यापक प्रसार देखने को मिल रहा है। ऐसे में सवाल उठने लगा है कि क्या यह बढ़ता चौतरफा दबाव शीर्ष निर्वाचन प्राधिकारी की संवैधानिक कुर्सी को हिला पाएगा?
संसदीय इतिहास में संभवतः यह पहला अवसर है जब किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध इतनी तीव्र और व्यापक लामबंदी देखने को मिल रही है। ‘INDIA’ गठबंधन के बैनर तले कांग्रेस, राजद, टीएमसी, वामपंथी दलों सहित अन्य विपक्षी घटक न केवल सड़कों पर उतरकर विरोध जता रहे हैं, अपितु युवा आंदोलनों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से भी ज्ञानेश कुमार की कार्यशैली को घेरा जा रहा है। विपक्ष का सीधा आरोप है कि पुनरीक्षण प्रक्रिया के नाम पर करोड़ों वैध मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से मनमाने ढंग से विलोपित किए जा रहे हैं, जबकि निर्वाचन आयोग का स्पष्ट मत है कि यह कवायद केवल डुप्लीकेट और अपात्र प्रविष्टियों को छांटने हेतु की जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट में विधिक चुनौती: नियुक्ति प्रक्रिया और एकतरफा फैसलों पर सवाल
सड़कों पर मचे घमासान के अतिरिक्त मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती न्यायपालिका के मंच से उभरी है। सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) में ज्ञानेश कुमार और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं के साथ-साथ उनके द्वारा एकतरफा निर्णय लेने के अधिकारों पर भी सवाल खड़े किए गए हैं। याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि 2023 के नए मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम के मानकों का उल्लंघन कर नियुक्तियां की गई हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ इन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है, जो ज्ञानेश कुमार के विधिक भविष्य हेतु अत्यंत संवेदनशील मानी जा रही है।
संवैधानिक संरक्षण बनाम अभूतपूर्व राजनीतिक गतिरोध
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के प्रावधानों के अंतर्गत मुख्य चुनाव आयुक्त को अत्यधिक मजबूत संवैधानिक सुरक्षा कवच प्राप्त है। पद से हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत (Impeachment) द्वारा प्रस्ताव पारित करना अनिवार्य होता है, जो वर्तमान राजनीतिक समीकरणों में अत्यंत कठिन प्रतीत होता है। तथापि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह चौतरफा आंदोलन लंबा खींचता है और सर्वोच्च न्यायालय से प्रक्रियात्मक त्रुटियों पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी आती है, तो नैतिक दबाव के कारण आयोग की साख पर गहरा संकट उत्पन्न हो सकता है।
सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस पूरे घटनाक्रम को विपक्ष की चुनावी हताशा करार देते हुए खारिज किया है। भाजपा नेताओं का तर्क है कि जब विपक्ष को चुनावों में पराजय की आशंका होती है, तो वे संवैधानिक संस्थाओं पर प्रश्नचिन्ह लगाना शुरू कर देते हैं। दूसरी ओर, विपक्षी खेमा इसे लोकतंत्र बचाने का अंतिम अवसर बताकर मुख्य चुनाव आयुक्त के पद त्यागने तक आंदोलन को और अधिक तीव्र करने की घोषणा कर चुका है।