भारतीय हिंदी और मराठी सिनेमा के महान व दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर के 75 वर्ष की आयु में गोवा में कार्डियक अरेस्ट के कारण हुए अचानक निधन से मनोरंजन जगत तथा समूचे देश में शोक की लहर व्याप्त है। अपनी बेबाक और दमदार अदाकारी से लाखों दिलों पर राज करने वाले नाना पाटेकर केवल एक उत्कृष्ट कलाकार ही नहीं थे, बल्कि वे व्यक्तिगत जीवन में एक समर्पित किसान और बेहद संवेदनशील इंसान भी थे। वे अक्सर कहते थे कि अभिनय उनका पेशा है, किंतु कृषि और माटी से जुड़ाव उनकी वास्तविक आत्मा एवं पहचान है।
पुणे के निकट खडकवासला क्षेत्र में डोंजे गांव स्थित उनका 27 एकड़ में फैला विशाल फार्म हाउस उनकी इस कृषि-निष्ठा का प्रत्यक्ष प्रमाण था। नाना पाटेकर अपनी व्यस्त शूटिंग शेड्यूल से समय निकालकर नियमित रूप से अपने फार्म हाउस पहुंचते थे और स्वयं ट्रैक्टर चलाने से लेकर बुवाई-कटाई तक का कार्य करते थे। वे अपने इस खेत में मुख्य रूप से गेहूं, चना, धान और विभिन्न मौसमी जैविक सब्जियों का उत्पादन करते थे। उनके द्वारा उगाई जाने वाली फसलें और उनके उगाने का पारम्परिक तरीका हमेशा से ही स्थानीय किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा।
नाना पाटेकर की संवेदनशीलता केवल अपने खेत तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त क्षेत्रों और संकटग्रस्त किसानों की सहायता में उन्होंने मिसाल कायम की। जब वर्ष 2015-16 के दौरान मराठवाड़ा और विदर्भ क्षेत्रों में बारिश न होने के कारण भीषण सूखा पड़ा और किसान आत्महत्या की स्थिति में पहुंचे, तब नाना पाटेकर आगे आए। उन्होंने मराठी अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर ‘नाम फाउंडेशन’ (NAAM Foundation) नामक सामाजिक संस्था की स्थापना की, जिसके माध्यम से उन्होंने सूखा प्रभावित क्षेत्रों में व्यापक जल संरक्षण, नदियों के पुनरुद्धार और जल निकायों के गहरीकरण का कार्य कराया।
अपने अभिनय और कृषि से अर्जित आय का एक बड़ा हिस्सा नाना पाटेकर ने सीधे पीड़ित किसान परिवारों को समर्पित कर दिया। उन्होंने सैकड़ों आत्महत्या कर चुके किसानों के आश्रित परिवारों और विधवाओं को सीधे आर्थिक सहायता चेक वितरित किए तथा उनके बच्चों की शिक्षा का उत्तरदायित्व उठाया। कई बार ऐसा हुआ कि उन्होंने अपने व्यक्तिगत खर्चों में कटौती करके करोड़ों रुपये की सहायता राशि किसान कल्याण फंड में दान कर दी। उनका स्पष्ट दृष्टिकोण था कि जब तक देश का अन्नदाता सशक्त और समृद्ध नहीं होगा, तब तक राष्ट्र का वास्तविक विकास असंभव है।
पुणे के पास स्थित उनके फार्म हाउस में ही राज्य सरकार द्वारा राजकीय सम्मान के साथ उनके अंतिम संस्कार की तैयारियां की जा रही हैं। उनके निधन से न केवल भारतीय सिनेमा ने अपनी बुलंद और क्रांतिवीर आवाज खो दी है, अपितु देश के कृषक समाज ने अपना एक सच्चा और निस्वार्थ हमदर्द खो दिया है। उनके सामाजिक योगदान और किसान हितैषी कार्यों के लिए समाज और देश उन्हें सदैव आदर के साथ स्मरण रखेगा।