पंजाब के मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) से जुड़े कथित ट्रांसफर-पोस्टिंग, टेंडरों के आवंटन और सीएलयू (चेंज ऑफ लैंड यूज) में भ्रष्टाचार के आरोपों की केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से जांच कराने के पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध भगवंत मान सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) का द्वार खटखटाया है। राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए इस जांच पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने की याचना की है। राज्य सरकार का यह विधिक कदम पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा मामले की जांच सीबीआई को सौंपने और दो माह के भीतर स्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश के पश्चात सामने आया है।
यह संपूर्ण विवाद प्रवर्तन निदेशालय (ED) की एक गहन जांच के उपरांत प्रकाश में आया था। ईडी ने पंजाब के पुलिस महानिदेशक (DGP) गौरव यादव को तीन औपचारिक पत्र प्रेषित कर अवगत कराया था कि राज्य में प्रशासनिक अधिकारियों के स्थानांतरण, पदस्थापना, भूमि उपयोग परिवर्तन तथा शस्त्र लाइसेंस जारी करने की प्रक्रियाओं में एक संगठित रिश्वतखोरी नेटवर्क कार्य कर रहा है। अधिवक्ता निखिल सराफ द्वारा दायर जनहित याचिका में आरोप लगाया गया कि ईडी के गंभीर अलर्ट के बावजूद पंजाब पुलिस द्वारा कोई ठोस वैधानिक कार्रवाई नहीं की गई।
पंजाब सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में दायर अपनी विशेष अनुमति याचिका (SLP) में तकनीकी एवं संवैधानिक आधार प्रस्तुत किए हैं। राज्य सरकार का तर्क है कि वर्ष 2020 में तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा सीबीआई को राज्य में जांच करने हेतु दी गई ‘सामान्य सहमति’ (General Consent) वापस ले ली गई थी, अतः राज्य सरकार की सहमति के बिना सीबीआई को सीधे जांच सौंपना संघीय व्यवस्था के सिद्धांतों के अनुकूल नहीं है। इसके अतिरिक्त, सरकार का यह भी कहना है कि राज्य की अपनी पुलिस और सतर्कता एजेंसियां निष्पक्ष जांच करने में पूर्णतः सक्षम हैं।
दूसरी ओर, उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने यह गंभीर चिंता व्यक्त की थी कि मामले के व्हिसलब्लोअर्स को डराने-धमकाने का प्रयास किया जा रहा है और याचिका दायर होते ही याचिकाकर्ता की संपत्ति के विरुद्ध ध्वस्तीकरण की कार्रवाई के आदेश जारी कर दिए गए थे। इन तथ्यों तथा पंजाब पुलिस की कथित निष्क्रियता का संज्ञान लेते हुए उच्च न्यायालय ने निष्पक्षता बनाए रखने हेतु मामले की जांच सीबीआई को सौंपने का निर्णय सुनाया था।
इस न्यायिक घटनाक्रम ने पंजाब के राजनीतिक परिदृश्य में भारी हलचल उत्पन्न कर दी है। शिरोमणि अकाली दल, भारतीय जनता पार्टी तथा कांग्रेस सहित प्रमुख विपक्षी दलों ने उच्च न्यायालय के आदेश का स्वागत करते हुए आम आदमी पार्टी की सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए हैं। वहीं, आम आदमी पार्टी के प्रतिनिधियों का कहना है कि केंद्र सरकार केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग करके राज्य सरकार की छवि धूमिल करने का प्रयास कर रही है।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस विशेष अनुमति याचिका पर शीघ्र सुनवाई किए जाने की संभावना है। शीर्ष अदालत का यह निर्णय न केवल पंजाब सरकार की प्रशासनिक साख के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण होगा, अपितु राज्य सरकारों की सहमति के बिना केंद्रीय एजेंसियों द्वारा की जाने वाली जांच से जुड़े संवैधानिक प्रश्नों को भी पुनारोधित करेगा। उच्च न्यायालय ने इस प्रकरण में अगली सुनवाई हेतु 7 दिसंबर 2026 की तिथि निर्धारित की है।