महाराष्ट्र में शिवसेना के नाम और उसके मूल चुनाव चिह्न (तीर-कमान) के अधिकार को लेकर सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) में जारी कानूनी लड़ाई की सुनवाई स्थगित कर दी गई है। भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष बुधवार को हुई इस महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे नीत गुट ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा उनके पक्ष में सुनाए गए फैसले का पुरजोर समर्थन किया। शीर्ष अदालत ने प्रकरण की जटिलता को देखते हुए मामले की बहस को कल तक के लिए टाल दिया है।
सुनवाई के दौरान शिंदे गुट का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता एन. के. कौल ने चुनाव आयोग द्वारा ‘धनुष-बाण’ निशान शिंदे धड़े को सौंपने के निर्णय को पूर्णतः न्यायसंगत और संवैधानिक ठहराया। उन्होंने दलील दी कि निर्वाचन आयोग ने सभी वैधानिक मापदंडों, विधायी बहुमत और संगठनात्मक पहलुओं की सघन समीक्षा करने के उपरांत ही अपना अंतिम निष्कर्ष दिया था, जिसमें हस्तक्षेप का कोई औचित्य नहीं बनता।
पार्टी संविधान और रिकॉर्ड को लेकर वरिष्ठ अधिवक्ता कौल का बड़ा तर्क
अदालत में अपनी पक्ष रखते हुए सीनियर एडवोकेट एन. के. कौल ने कहा कि निर्वाचन आयोग के पास आधिकारिक रिकॉर्ड में केवल 2011 का पार्टी संविधान ही उपलब्ध था। उन्होंने स्पष्ट किया कि विवाद तब उत्पन्न हुआ जब बिना आयोग को सूचित किए पार्टी संविधान में फेरबदल के दावे किए जाने लगे। कौल ने पीठ को बताया कि ऐसा कोई प्रामाणिक साक्ष्य मौजूद नहीं है जिससे यह सिद्ध हो सके कि 2011 के बाद किसी नए संशोधित संविधान की प्रति चुनाव आयोग को विधिवत सौंपी गई थी।
‘अयोग्यता याचिकाओं के नाम पर चुनाव चिह्न का फैसला नहीं रोका जा सकता’
उद्धव ठाकरे गुट द्वारा विधायकों की अयोग्यता याचिकाएं लंबित होने का हवाला दिए जाने पर शिंदे गुट ने कड़ा प्रतिवाद किया। एन. के. कौल ने कहा कि अयोग्यता याचिका दायर होना और उस पर अंतिम निर्णय आना दो सर्वथा भिन्न कानूनी विषय हैं। यदि जब तक अयोग्यता की प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक चुनाव चिह्न के आवंटन को रोका जाता है, तो यह अनिश्चितकाल के लिए लटक जाएगा। मतदाताओं के मध्य पार्टी की पहचान बनाए रखने हेतु निर्वाचन आयोग का समयबद्ध निर्णय आवश्यक था।
आंतरिक लोकतंत्र पर सर्वोच्च न्यायालय का ध्यान आकर्षित
शिंदे गुट के वकील ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्ववर्ती दृष्टांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि राजनीतिक दल ही हमारे लोकतांत्रिक ढांचे के मुख्य स्तंभ हैं। यदि किसी दल के भीतर समयबद्ध आंतरिक चुनाव नहीं होते और लोकतांत्रिक सिद्धांतों की उपेक्षा की जाती है, तो ऐसे में विधायी बहुमत ही वैध परीक्षण का आधार बनता है। उन्होंने दावा किया कि शिंदे गुट के पास सांसदों और विधायकों का भारी बहुमत उपलब्ध था, जिसके आधार पर ही आयोग ने ‘धनुष-बाण’ का अधिकार प्रदान किया है।
सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ द्वारा कल इस मामले पर आगे की सुनवाई पुनः प्रारंभ की जाएगी। उद्धव ठाकरे गुट की ओर से चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र और निष्पक्षता पर उठाए गए प्रश्नों तथा शिंदे गुट द्वारा दी गई दलीलों के मध्य यह कानूनी बहस महाराष्ट्र की भावी राजनीति और पार्टी प्रतीकों के संवैधानिक स्वरूप के लिए अत्यंत निर्णायक मानी जा रही है।