जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन के उपरांत केंद्र शासित प्रदेश की विधानसभा में राज्य का दर्जा (स्टेटहुड) तत्काल बहाल करने संबंधी प्रस्ताव को लेकर भयंकर राजनीतिक एवं प्रशासनिक घमासान छिड़ गया है। मुख्य सचिव (मुख्य सचिव) और विधि सचिव द्वारा प्रस्ताव के विरोध में विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) को पत्र लिखे जाने की घटना सामने आने के उपरांत सदन में तीखी बहस और जोरदार हंगामा देखने को मिला। इस अभूतपूर्व प्रशासनिक हस्तक्षेप पर कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि देश के किसी भी अन्य राज्य में ऐसा देखने को नहीं मिलता जहां निर्वाचित मुख्यमंत्री द्वारा पेश किए गए प्रस्ताव के विरोध में राज्य की नौकरशाही ही कार्य करने लगे।
प्रकरण की शुरुआत उस समय हुई जब मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने विधानसभा में जम्मू-कश्मीर को तत्काल पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग का प्रस्ताव प्रस्तुत किया। इस प्रस्ताव में जून 2000 में पारित स्वायत्तता (ऑटोनॉमी) प्रस्ताव का भी संदर्भ दिया गया था। विधानसभा सत्र के दौरान जब प्रस्ताव पर चर्चा जारी थी, तब यह तथ्य उजागर हुआ कि शीर्ष नौकरशाहों ने प्रस्ताव को स्वीकार न करने का सुझाव देते हुए अध्यक्ष को लिखित पत्र भेजा था। सोमवार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कड़े विरोध और सदन से बहिर्गमन (वॉकआउट) के मध्य यह प्रस्ताव अंततः विधानसभा में बहुमत से पारित कर दिया गया।
नौकरशाही के इस कृत्य पर भड़कते हुए मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सदन के पटल से प्रश्न किया कि क्या भारत के किसी भी राज्य में ऐसी व्यवस्था संभव है जहां मुख्य सचिव और विधि सचिव मुख्यमंत्री द्वारा लाए गए प्रस्ताव के विरुद्ध जाकर पत्राचार करें। उन्होंने कहा कि यह केवल एक केंद्र शासित प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था की विडंबना है, जहां निर्वाचित सरकार के अधिकारों को सीमित करने का प्रयास किया जा रहा है। उमर अब्दुल्ला ने स्पष्ट किया कि उन्हें और उनकी सरकार को इन प्रशासनिक पत्रों की जानकारी तब मिली जब विधानसभा सचिवालय द्वारा उन्हें इस विषय से अवगत कराया गया।
दूसरी ओर, विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी और विपक्षी खेमे ने इस संपूर्ण प्रक्रिया पर कड़ा एतराज व्यक्त करते हुए हंगामा जारी रखा। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा ने नौकरशाहों की आपत्तियों की अनदेखी करने का आरोप लगाते हुए विधानसभा अध्यक्ष अब्दुल रहीम राथर को पद से हटाने की मांग कर डाली। भाजपा विधायकों ने तर्क दिया कि स्वायत्तता संबंधी पुराने संदर्भों को प्रस्ताव में सम्मिलित करना नियमों का उल्लंघन है, जबकि सत्ता पक्ष (नेशनल कॉन्फ्रेंस) के विधायकों ने मेजें थपथपाकर मुख्यमंत्री के इस कदम का पुरजोर समर्थन किया।
प्रशासकीय खींचतान और राजनीतिक टकराव के कारण विधानसभा की कार्यवाही बार-बार बाधित हुई। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अंत में कहा कि नौकरशाही का यह रवैया ही इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि जम्मू-कश्मीर को अविलंब पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि 1.4 करोड़ जनता के जनादेश और लोकतांत्रिक गरिमा की रक्षा के लिए निर्वाचित सरकार को पूर्ण प्रशासनिक अधिकार मिलना अनिवार्य है। इस घटनाक्रम ने जम्मू-कश्मीर में निर्वाचित सरकार और नौकरशाही के संबंधों के बीच मौजूद गंभीर खाई को उजागर कर दिया है।