लिस्टेड कंपनियों ने वित्त वर्ष 2024-25 में म्यूचुअल फंड में ₹3.8 लाख करोड़ का निवेश किया है, जो 1990-91 के बाद का सबसे बड़ा आंकड़ा है। इससे पहले 2020-21 में यह निवेश ₹3.6 लाख करोड़ के उच्चतम स्तर पर था। बाजार में अनिश्चितता, सीमित वृद्धि के अवसर और बैंक डिपॉजिट पर कम ब्याज दरें इस वृद्धि के मुख्य कारण माने जा रहे हैं।
जानकारों के मुताबिक, फिलहाल गैर-वित्तीय कंपनियों के पास ₹7.4 लाख करोड़ का नकद बैलेंस है, जो कोरोना से पहले के ₹3.4 लाख करोड़ से दोगुने से भी ज्यादा है। मौजूदा उत्पादन क्षमता पर्याप्त रूप से इस्तेमाल हो रही है, इसलिए कंपनियां नई क्षमता में निवेश करने की बजाय म्यूचुअल फंड में पैसा लगा रही हैं। वित्त वर्ष 2025 में कुल संपत्ति के अनुपात में म्यूचुअल फंड में निवेश 3.2% रहा, जो पिछले वर्षों की तुलना में स्थिर है।
2016-17 में नोटबंदी के समय यह अनुपात सबसे अधिक 4.3% तक पहुंचा था। कंपनियां ज्यादातर स्थिर आय वाले फंड्स में निवेश कर रही हैं, क्योंकि उन्हें रिटर्न से ज्यादा पूंजी सुरक्षित रखने की आवश्यकता है। बैंक डिपॉजिट पर मिलने वाला कम ब्याज भी फंड की ओर निवेश मोड़ने का बड़ा कारण है। उदाहरण के लिए, जुलाई में शेड्यूल्ड बैंकों द्वारा नई जमाओं पर केवल 5.61% ब्याज दिया गया था, जो पिछले 33 महीनों का सबसे निचला स्तर है।
AMFI के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 में कॉर्पोरेट का कुल निवेश ₹23.6 लाख करोड़ तक पहुंच गया, जो 2018-19 के अंत में ₹9.6 लाख करोड़ था। 2019 से 2025 के बीच, इक्विटी फंड्स में कॉर्पोरेट निवेश 129% बढ़कर ₹5.4 लाख करोड़ हो गया, जबकि नॉन-इक्विटी आवंटन 152% बढ़कर ₹18.2 लाख करोड़ हो गया।