निर्यात क्षेत्र में बढ़ती चुनौतियों के बीच RBI अब डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी को ज्यादा सहन करने की नीति अपना रहा है। ट्रेड डेफिसिट बढ़ने और डॉलर इनफ्लो घटने से भारत पर बाहरी दबाव बढ़ा है। रुपया तेज गिरावट न दिखाए, इसलिए RBI ने बड़े पैमाने पर बाजार में डॉलर बेचे, लेकिन पिछले आठ सत्रों में भी रुपया 1.40% से अधिक गिरा है।
विश्लेषकों का कहना है कि अब RBI केवल अत्यधिक अस्थिरता या सट्टेबाजी की स्थिति में ही हस्तक्षेप करेगा। अमेरिका के बढ़ते प्रोटेक्शनिज़्म से रुपये पर दबाव और बढ़ गया है।
2024 के बाद से रुपया लगातार कमजोर है—पिछले वर्ष 84 रुपये प्रति डॉलर की दर अब 90 रुपये से ऊपर पहुँच गई है। कई बैंकर्स का मानना है कि जब मूलभूत आर्थिक स्थितियाँ रुपये के खिलाफ हों, तब फॉरेक्स रिजर्व से बड़ी बिक्री का खास फायदा नहीं होता।
डॉलर की मजबूती से निर्यातकों को लाभ मिलता है, लेकिन आयात महंगा होता है। इस बीच अमेरिका द्वारा भारत के कई उत्पादों पर 50% तक टैरिफ लगाने से भारतीय निर्यात पर बड़ा असर पड़ा है।
रुपये की कमजोरी से FPI निवेश पर भी दबाव बढ़ता है। विशेषज्ञों के अनुसार कमजोर निर्यात, FPI आउटफ्लो और उच्च अमेरिकी टैरिफ मिलकर रुपये को नीचे धकेल रहे हैं।
हालाँकि, भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था इस झटके को काफी हद तक झेल सकती है। कंपनियों की कमाई अनुमान पर अभी कोई नकारात्मक असर नहीं दिख रहा। यदि अमेरिका के साथ व्यापार समझौता आगे बढ़ता है और स्थानीय आय में सुधार आता है, तो FPI फिर से लौट सकते हैं।