माँ चंद्रघंटा की महिमा और स्वरूप
चैत्र नवरात्रि के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की उपासना की जाती है। देवी का यह स्वरूप अत्यंत शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है, जिसके कारण इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। स्वर्ण के समान चमकीले वर्ण वाली देवी के दस हाथ हैं, जिनमें कमल, धनुष-बाण, तलवार, त्रिशूल और गदा जैसे अस्त्र-शस्त्र विराजमान हैं। इनका वाहन सिंह है, जो साहस का प्रतीक है।
पूजा का विशेष महत्व और ‘रवि योग’
आज के दिन की विशेषता रवि योग है, जिसे ज्योतिष शास्त्र में कार्यों की सफलता के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। माँ चंद्रघंटा की पूजा करने से भक्तों के भय, रोग और दुख दूर होते हैं। विशेष रूप से जिनका आत्मविश्वास कमजोर है, उन्हें आज के दिन ‘मणिपुर चक्र’ पर ध्यान केंद्रित कर पूजा करनी चाहिए। इससे एकाग्रता और निडरता में वृद्धि होती है।
पूजा विधि और महत्वपूर्ण बिंदु
- कलश पूजन: सबसे पहले कलश और उसमें उपस्थित देवी-देवताओं की पूजा करें।
- भोग: माँ चंद्रघंटा को दूध या दूध से बनी मिठाइयों (जैसे खीर) का भोग लगाना अत्यंत प्रिय है।
- पुष्प: माता को लाल रंग के पुष्प, विशेषकर गुलाब अर्पित करना शुभ माना जाता है।
- मंत्र जाप: पूजा के दौरान “ॐ देवी चंद्रघंटायै नमः” मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करें।
- आरती: अंत में कपूर जलाकर माँ की आरती करें और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करें।