देवीपाटन मंडल की कमिश्नर दुर्गा शक्ति नागपाल और गोंडा की सिविल जज शबीना खान के बीच तीन दशक पुराने एक जमीन के मुकदमे को लेकर विवाद पैदा हो गया है। कमिश्नर नागपाल पर आरोप है कि उन्होंने सिविल जज शबीना खान को फोन करके प्रशासनिक दबाव बनाने, अनुचित टिप्पणी करने और पद का दुरुपयोग करने का प्रयास किया।
यह विवाद गोंडा शहर के ‘ज्योति विद्या मंदिर बनाम नगरपालिका परिषद’ से जुड़ा हुआ है, जो साल 1997 से कोर्ट में लंबित है। यह मामला कीमती सरकारी नजूल भूमि से संबंधित है, जिस पर 1985 में पट्टा निरस्त होने के बाद भी एक निजी स्कूल चल रहा है। सिविल जज शबीना खान की कोर्ट में इस मुकदमे पर स्टे चल रहा था।
4 अगस्त 2026 को सिविल जज शबीना खान ने जिला जज गोंडा को पत्र लिखकर कमिश्नर दुर्गा शक्ति नागपाल पर अनुचित दबाव बनाने का गंभीर आरोप लगाया। जज के अनुसार, 15 जुलाई 2026 को उनके मोबाइल पर अज्ञात नंबर से फोन आया, जिसे उनके 7 साल के बेटे ने उठाया। फोन करने वाली महिला ने बच्चे से निजी जानकारी मांगी। बाद में दोबारा फोन आने पर कमिश्नर दुर्गा शक्ति नागपाल ने बात की और छुट्टी व मुकदमे को लेकर सवाल किए।
विवाद बढ़ने पर कमिश्नर के स्टेनो ने कोर्ट आकर संपर्क कराया, जिसके बाद तीखी बातचीत हुई। जज का आरोप है कि कमिश्नर ने संस्कारों पर सवाल उठाए, शिकायत की धमकी दी और पद के प्रभाव का दुरुपयोग किया।
मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल की ओर से आधिकारिक सफाई जारी की गई। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य केवल सरकारी भूमि के संरक्षण और प्रभावी पैरवी की स्थिति जानना था। फोन पर मुकदमे के गुण-दोष, आदेश या नाम को लेकर कोई बात नहीं हुई थी। उन्होंने केवल पीठासीन अधिकारी के अवकाश से लौटने की जानकारी ली थी। मंडलायुक्त कार्यालय ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गरिमा का पूरा सम्मान करने की बात कही।
दोनों पक्षों के पत्रों और तथ्यों को सुनने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए माना कि यह पूरा घटनाक्रम प्रथम दृष्टया अदालत के कामकाज में प्रशासनिक हस्तक्षेप है। हाईकोर्ट ने मामले को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष उचित आपराधिक अवमानना पीठ के सामने पेश करने और अग्रिम निर्देश प्राप्त करने के लिए भेज दिया है।