सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद देश में अनुसूचित जाति (SC) के आरक्षण और लाभों के दुरुपयोग को लेकर जोरदार बहस छिड़ गई है। 24 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने चिंथाड़ा आनंद मामले में स्पष्ट किया कि हिंदू, सिख या बौद्ध के अलावा किसी अन्य धर्म (ईसाई या इस्लाम) को अपनाने पर व्यक्ति का SC दर्जा तुरंत और पूरी तरह समाप्त हो जाता है।
ओपिनियन आर्टिकल में मुख्य तर्क: लेखक सिद्धार्थ चेपुरी (BJYM नेशनल मेंबर) ने लिखा कि SC आरक्षण का मकसद उन दलितों को न्याय देना है जो अभी भी जातिगत भेदभाव का सामना करते हैं। लेकिन धर्मांतरण के बाद भी कई लोग पुराने SC प्रमाण-पत्र के आधार पर आरक्षण, नौकरी, कॉलेज सीट और SC/ST अत्याचार कानून का लाभ ले रहे हैं। इससे असली दलितों को नुकसान हो रहा है – एक दलित छात्र की कॉलेज सीट छिन जाती है, भूमिहीन मजदूर को सरकारी नौकरी नहीं मिलती और जातिगत हिंसा का शिकार व्यक्ति SC/ST एक्ट का संरक्षण नहीं पा पाता।
महाराष्ट्र के आंकड़े: 2008-2017 के बीच 14,000 से ज्यादा फर्जी जाति प्रमाण-पत्र रद्द किए गए। आंध्र प्रदेश RTI: 70-80% ईसाई पादरियों ने हिंदू SC/OBC प्रमाण-पत्र रखते हुए COVID राहत का फायदा उठाया, जबकि वे बपतिस्मा ले चुके थे।
क्यों जरूरी है फेथ रजिस्ट्री? लेखक ने सुझाव दिया है कि भारत को तुरंत Unified Civil Registry for Faith बनानी चाहिए। इसमें चर्च और मस्जिद जैसी धार्मिक संस्थाओं को 30 दिनों के अंदर धर्मांतरण की जानकारी Aadhaar से लिंक्ड सेंट्रल डेटाबेस में दर्ज करानी होगी। इससे SC प्रमाण-पत्र सिस्टम से ऑटोमैटिक मैचिंग होगी और फर्जी लाभ लेने वालों पर तुरंत रोक लग सकेगी।
अन्य सुझाव:
- हाई-प्रोफाइल लाभ (UPSC, चुनाव लड़ना आदि) के लिए समय-समय पर “सक्रिय धार्मिक अभ्यास” का एफिडेविट।
- गोपनीयता की सुरक्षा और शिकायत निवारण तंत्र।
लेखक का निष्कर्ष है कि आरक्षण कोई स्थायी अधिकार नहीं, बल्कि अस्थायी पुल है जो वास्तविक रूप से जातिगत भेदभाव झेल रहे लोगों तक ही पहुंचना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का फैसला सही दिशा में है, लेकिन इसे लागू करने के लिए फेथ रजिस्ट्री अब अनिवार्य हो गई है।