हिमालयी ग्लेशियरों की पिघलने की दर में भारी वृद्धि: ICIMOD की चेतावनी
इंटरनेशनल सेंटर फॉर Integrated माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) की हालिया रिपोर्ट ‘HKH Glacier Outlook 2026’ ने एक डरावनी तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के अनुसार, साल 2000 के बाद से हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने की दर पहले के मुकाबले दोगुनी हो गई है। यह स्थिति न केवल पर्यावरण के लिए खतरनाक है, बल्कि इस क्षेत्र पर निर्भर अरबों लोगों की आजीविका और सुरक्षा के लिए भी एक बड़ा संकेत है।
रिपोर्ट के मुख्य बिंदु:
- ग्लेशियरों का मानचित्रण: रिपोर्ट में लगभग 55,782 वर्ग किलोमीटर में फैले 63,761 ग्लेशियरों का अध्ययन किया गया है। ये ग्लेशियर एशिया की 10 प्रमुख नदी प्रणालियों के स्रोत हैं।
- अत्यधिक संवेदनशीलता: समुद्र तल से 4,500 से 6,000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित लगभग 78% ग्लेशियर क्षेत्र तापमान वृद्धि के प्रति बेहद संवेदनशील हैं।
- छोटे ग्लेशियरों पर खतरा: 0.5 वर्ग किलोमीटर से छोटे ग्लेशियर सबसे तेजी से सिमट रहे हैं। ये छोटे ग्लेशियर स्थानीय समुदायों के लिए पानी का मुख्य स्रोत होते हैं, जिनके सूखने से जल संकट गहरा सकता है।
- आपदाओं की आशंका: ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के कारण Glacial Lake Outburst Floods (GLOF) यानी हिमनद झील फटने से आने वाली बाढ़ का खतरा बढ़ गया है, जैसा कि हाल के वर्षों में सिक्किम और चमोली जैसी आपदाओं में देखा गया है।
- नदियों पर असर: गंगा और ब्रह्मपुत्र बेसिन में ग्लेशियरों के क्षेत्र में क्रमशः 21% और 16% की भारी कमी दर्ज की गई है।
ICIMOD के महानिदेशक पेमा ग्यामत्सो के अनुसार, यह डेटा कार्रवाई करने के लिए एक चेतावनी है। यदि अभी निगरानी और अनुकूलन (adaptation) पर निवेश नहीं किया गया, तो भविष्य में विनाशकारी बाढ़ और पानी की भारी कमी अपरिहार्य है।