बेंजामिन नेतन्याहू की युद्ध नीतियों ने अमेरिका को कूटनीतिक जाल में फंसाया; मध्य पूर्व में शांति के बजाय बढ़ता सैन्य टकराव
इजरायल और हमास-ईरान के बीच जारी भीषण युद्ध ने अमेरिका और इजरायल के दशकों पुराने रिश्तों को एक नए और जटिल मोड़ पर खड़ा कर दिया है। ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के विश्लेषण के अनुसार, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की मौजूदा रणनीति ने अमेरिका को एक ऐसी स्थिति में धकेल दिया है जिसे विशेषज्ञों ने ‘स्टॉकहोम सिंड्रोम’ की संज्ञा दी है। जहाँ एक समय अमेरिका ‘ओस्लो समझौते’ के माध्यम से शांति का पैरोकार था, वहीं अब वह इजरायल की आक्रामक नीतियों का बंधक बनता नजर आ रहा है।
विश्लेषण के मुख्य बिंदु:
- शांति समझौतों का अंत: 1990 के दशक में हुए ओस्लो समझौते (Oslo Accords) का उद्देश्य दो-राष्ट्र समाधान (Two-state solution) था, लेकिन नेतन्याहू के नेतृत्व में इजरायल ने धीरे-धीरे उन संभावनाओं को खत्म कर दिया है।
- अमेरिका की मजबूरी: राष्ट्रपति जो बाइडेन का प्रशासन इजरायल की सैन्य कार्रवाई का समर्थन तो कर रहा है, लेकिन नेतन्याहू द्वारा अमेरिकी सलाहों की अनदेखी करने से वाशिंगटन में भारी नाराजगी है। इसके बावजूद अमेरिका, इजरायल को सैन्य सहायता देने के लिए ‘मजबूर’ दिख रहा है।
- ईरान के साथ सीधा टकराव: इजरायल द्वारा ईरान के परमाणु और ऊर्जा ठिकानों पर हमले की योजना ने अमेरिका को एक क्षेत्रीय युद्ध के मुहाने पर खड़ा कर दिया है, जिसे रोकने में अमेरिका अब तक विफल रहा है।
- राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई: रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू के लिए यह युद्ध उनके राजनीतिक अस्तित्व को बचाने का जरिया बन गया है, जबकि अमेरिका के लिए यह एक कूटनीतिक दुःस्वप्न साबित हो रहा है।
- वैश्विक छवि को नुकसान: मध्य पूर्व में इजरायल के प्रति अमेरिका के अटूट समर्थन ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों और अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रति अमेरिका की साख पर सवाल खड़े कर दिए हैं।