मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के बीच ईरान द्वारा संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) पर किए जा रहे हमलों ने क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा दिया है। यूएई रक्षा मंत्रालय के अनुसार, 28 फरवरी से अब तक ईरान ने अमीरात पर सैकड़ों बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों के साथ बड़ी संख्या में कामिकेज़ ड्रोन दागे हैं। हालांकि, यूएई की उन्नत वायु रक्षा प्रणाली ने अधिकांश हमलों को निष्क्रिय कर दिया है।
हाल ही में अबू धाबी के एक तेल क्षेत्र पर ईरानी मिसाइल हमला हुआ, जिसके चलते कुछ समय के लिए हवाई क्षेत्र बंद करना पड़ा। भले ही हमलों की तीव्रता में कमी आई हो, लेकिन ईरान अब भी दुबई, अबू धाबी और शारजाह जैसे प्रमुख आर्थिक शहरों को निशाना बना रहा है, जो वैश्विक वित्तीय केंद्र के रूप में उभर रहे हैं।
ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने इन हमलों को यह कहकर उचित ठहराया है कि यूएई अमेरिका के सैन्य प्रयासों का समर्थन करता है और अब्राहम समझौते का हिस्सा है। विश्लेषकों का मानना है कि इन हमलों का उद्देश्य केवल सैन्य नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर ध्यान आकर्षित करना और क्षेत्रीय जनमत को प्रभावित करना भी है।
वर्तमान स्थिति में यूएई और अन्य खाड़ी देशों के पास ईरान के मिसाइल ठिकानों पर सीधे हमला करने की सीमित क्षमता है, जिससे वे अपनी सुरक्षा के लिए काफी हद तक अमेरिका पर निर्भर हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान खाड़ी देशों को यह संदेश देना चाहता है कि अमेरिका भी उन्हें पूरी तरह सुरक्षा नहीं दे सकता।
संघर्ष के 18वें दिन हमलों की संख्या में कुछ कमी आई है, लेकिन आशंका है कि मार्च के अंत तक यह स्थिति बनी रह सकती है। इस बीच होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और तेल की कीमतों पर भी असर पड़ रहा है।
ईरान ने खाड़ी देशों के सामने स्पष्ट विकल्प रखा है कि वे या तो अपने यहां से अमेरिकी सैन्य उपस्थिति को समाप्त करें या फिर ऐसे हमलों और आर्थिक नुकसान का सामना करते रहें। विश्लेषकों का मानना है कि जब तक ईरान के भीतर राजनीतिक परिवर्तन नहीं होता, तब तक क्षेत्र में इस प्रकार का असममित युद्ध जारी रह सकता है।