अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की बढ़ी हुई टैरिफ नीति ने भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने एक नया चुनौतीपूर्ण माहौल खड़ा कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह “टैरिफ वॉर” केवल निर्यात क्षेत्र के लिए ही नहीं बल्कि बैंकों और MSME सेक्टर के लिए भी जोखिम भरा साबित हो सकता है। स्थानीय रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार ट्रम्प के टैरिफ युद्ध का सीधा प्रभाव छोटे और मझोले उद्योगों की ऋण चुकाने की क्षमता पर पड़ सकता है। टैरिफ बढ़ने से इनकी आमदनी और निर्यात दोनों में कमी आएगी, जिससे बैंकों का बकाया ऋण (NPA) बढ़ने की आशंका है।
रिपोर्ट के अनुसार, MSME क्षेत्र में NPA वित्त वर्ष 2025-26 के अंत तक 3.9% तक पहुंच सकता है, जबकि वर्ष 2024-25 में यह 3.59% था। क्रिसिल का कहना है कि यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से अमेरिका द्वारा भारत के निर्यात पर लगाए गए 50% तक के टैरिफ का परिणाम होगी। विश्लेषण के अनुसार, कपड़ा, वस्त्र, कालीन, रत्न-आभूषण और प्रसंस्कृत सीफूड जैसे उद्योग सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं क्योंकि इनकी निर्यात में अमेरिकी बाजार की बड़ी हिस्सेदारी है। इन क्षेत्रों में लोन की वसूली मुश्किल होने की आशंका जताई जा रही है।
ट्रम्प प्रशासन स्थानीय अमेरिकी उद्योगों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए भारत सहित कई देशों पर अतिरिक्त कर लगा रहा है। विशेष रूप से रूस से तेल आयात जारी रखने के कारण भारत पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाया गया है, जिससे कुल टैरिफ 50% तक पहुंच गया है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस कदम से भारत के लगभग 60 अरब डॉलर के निर्यात पर सीधा प्रभाव पड़ेगा। इसके परिणामस्वरूप बैंकिंग क्षेत्र और MSME उद्योगों के लिए आने वाले महीने चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं।