अमेरिका द्वारा H1B वीज़ा फीस में हाल ही में की गई बढ़ोतरी से भारत में डॉलर के प्रवाह में कमी आने की संभावना है। अनुमान है कि इस कदम से भारत के सेवा क्षेत्र को झटका लगेगा और इनवर्ड रेमिटेंस घटेगा, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ेगा। वर्तमान में भारत को मिलने वाले रेमिटेंस में लगभग 28% प्रवाह अमेरिका से आता है, जो करीब 35 अरब डॉलर के बराबर है। लेकिन ऊंची वीज़ा फीस के कारण अमेरिका में H1B वीज़ाधारक भारतीयों की संख्या घटेगी और नतीजतन सालाना रेमिटेंस में 400 मिलियन डॉलर तक का झटका लग सकता है।
इस समय रुपया प्रति डॉलर 88.31 के स्तर पर कमजोर दिख रहा है। डॉलर के प्रवाह में कमी से इस पर और दबाव आ सकता है। भारत के 280 अरब डॉलर के आईटी सेवा उद्योग के लिए भी यह बड़ा झटका है, क्योंकि यह कंपनियां अपने कर्मचारियों को H1B वीज़ा पर अमेरिका भेजकर ग्राहकों की जरूरतें पूरी करती हैं। आईटी क्षेत्र का देश के GDP में 7% हिस्सा है और लगभग 60 लाख लोगों को रोजगार देता है।
यह निर्णय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका में रोजगार बढ़ाने के उद्देश्य से लिया है। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम अमेरिकी कंपनियों के लिए ही महंगा साबित हो सकता है, जिसके चलते वे भारत जैसे देशों में अपने ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) का विस्तार कर सकती हैं। वर्तमान में माइक्रोसॉफ्ट, मॉर्गन स्टैनली और गूगल जैसी बड़ी कंपनियां भारत में ऐसे सेंटर्स चला रही हैं।