महाराष्ट्र के नए धर्म की स्वतंत्रता कानून, 2026 को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। ठाणे के भिवंडी निवासी 70 वर्षीय इस्लामी विद्वान मौलाना हलीमुल्लाह फारूक अहमद खान ने याचिका दायर कर कानून की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए हैं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि कानून के कुछ प्रावधान लोगों की धार्मिक स्वतंत्रता, निजता और अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने के मौलिक अधिकार में दखल देते हैं।
याचिका में खास तौर पर कानून की धारा 2(ए) को चुनौती दी गई है, जिसमें धर्म परिवर्तन के लिए ‘प्रलोभन’ या आकर्षण की परिभाषा में ‘बेहतर जीवनशैली’ और ‘दैवीय उपचार’ जैसे शब्द शामिल किए गए हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि इन शब्दों की परिभाषा बहुत व्यापक और अस्पष्ट है, जिसके चलते सामान्य धार्मिक शिक्षा, सामाजिक सेवा या धार्मिक गतिविधियां भी कानून के दायरे में आ सकती हैं।
याचिका में धारा 6 पर भी सवाल उठाया गया है। इस प्रावधान के तहत धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति को पहले से सूचना देने की व्यवस्था है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि निजी तौर पर धर्म बदलने जैसे फैसले के लिए 60 दिन पहले सूचना देने की शर्त व्यक्ति की निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता में सरकारी दखल बढ़ा सकती है।
मौलाना हलीमुल्लाह ने कानून की धारा 13 को भी चुनौती दी है। याचिका के मुताबिक इस प्रावधान से आरोपी पर ही सबूत का बोझ आने की स्थिति बन सकती है, जो सामान्य कानूनी सिद्धांतों और निर्दोष माने जाने की संवैधानिक धारणा को प्रभावित कर सकती है। इसके अलावा महिलाओं के धर्म परिवर्तन से जुड़े मामलों में अधिक सजा के प्रावधान पर भी सवाल उठाया गया है और इसे लैंगिक भेदभाव वाला बताया गया है।
याचिका में अंतरधार्मिक विवाह और संबंधों का मुद्दा भी उठाया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि अगर किसी रिश्ते या विवाह में बल, धोखा या जबरदस्ती नहीं है और दोनों वयस्क अपनी इच्छा से फैसला लेते हैं, तो केवल अलग-अलग धर्म होने के आधार पर ऐसे रिश्तों को सरकारी निगरानी या अतिरिक्त जांच के दायरे में नहीं रखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक जीवनसाथी चुनना और अपने धर्म के बारे में फैसला करना व्यक्ति की स्वायत्तता, गरिमा, निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा अधिकार है।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि कानून की कुछ धाराएं ऐसी स्थिति पैदा कर सकती हैं, जिससे लोगों के निजी फैसलों पर सरकारी हस्तक्षेप बढ़ेगा। याचिकाकर्ता ने बॉम्बे हाईकोर्ट से कानून को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है। वैकल्पिक तौर पर उन्होंने अदालत से इन प्रावधानों की ऐसी व्याख्या करने का अनुरोध किया है, जिससे कानून केवल बल, धोखाधड़ी या जबरन धर्म परिवर्तन जैसे वास्तविक मामलों तक सीमित रहे।
महाराष्ट्र के इस नए कानून को लेकर मामला अब न्यायिक जांच के दायरे में पहुंच गया है। याचिका में उठाए गए सवालों का केंद्र व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता और निजी जीवन के अधिकार तथा धर्म परिवर्तन को नियंत्रित करने के राज्य के अधिकार के बीच संतुलन है। बॉम्बे हाईकोर्ट में इस चुनौती के बाद कानून के कई प्रावधानों की संवैधानिक वैधता पर महत्वपूर्ण कानूनी बहस होने की संभावना है।