वर्ल्ड बैंक की ताज़ा ‘कमोडिटी मार्केट आउटलुक’ रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2026 तक वैश्विक कमोडिटी कीमतें छह वर्षों के निचले स्तर पर पहुंच सकती हैं। यह लगातार चौथे वर्ष गिरावट का संकेत है। वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता, कच्चे तेल की बढ़ती आपूर्ति और नीतिगत अस्थिरता के चलते कमजोर आर्थिक विकास कमोडिटी बाज़ारों पर दबाव डाल रहा है। वर्ल्ड बैंक का अनुमान है कि 2025 और 2026 के दौरान कमोडिटी की कीमतों में औसतन 7% तक की गिरावट हो सकती है। वर्ल्ड बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री इंदरमीत गिल ने कहा कि कमोडिटी बाज़ारों ने अल्पावधि में वैश्विक अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने में मदद की है, लेकिन यह राहत लंबे समय तक नहीं टिकेगी। उन्होंने सरकारों को सलाह दी कि इस अनुकूल स्थिति का उपयोग वित्तीय स्थिरता को मजबूत करने में करना चाहिए।
कच्चे तेल की आपूर्ति में बढ़ोतरी का असर सबसे स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है। चीन में इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की बढ़ती मांग और स्थिर खपत के कारण तेल की कुल मांग धीमी पड़ी है। प्रमुख उत्पादकों की बढ़ती आपूर्ति के चलते वर्ष 2026 में ब्रेंट कच्चे तेल की औसत कीमत $60 प्रति बैरल तक गिर सकती है, जो पिछले पांच वर्षों के निचले स्तर के बराबर है। खाद्य पदार्थों के बाज़ार में भी गिरावट का रुझान दिखाई दे रहा है। चावल और गेहूं के दाम घटने से 2025 में खाद्य वस्तुओं की कीमतों में लगभग 6.1% की कमी और 2026 में भी कुछ और गिरावट की संभावना है। हालांकि उर्वरक की कीमतों में तत्काल कमी के बाद अगले वर्ष 21% की वृद्धि दर्ज की जा सकती है। भू-राजनीतिक तनाव और नीतिगत अनिश्चितता के बीच निवेशक सुरक्षित निवेश के रूप में सोने की ओर झुक रहे हैं। वर्ष 2025 में सोने की कीमतों में 42% की बढ़ोतरी और 2026 में भी तेजी बने रहने का अनुमान है।
ये दाम 2015-2019 के औसत से दोगुने होंगे। चांदी की कीमतें भी अनुमानित अवधि में रिकॉर्ड ऊंचाई को छू सकती हैं। वर्ल्ड बैंक ने चेतावनी दी है कि दीर्घकालिक व्यापार तनाव, इलेक्ट्रिक वाहनों के तेज़ अपनाव और ओपेक-प्लस देशों की बढ़ती उत्पादन क्षमता के चलते कमोडिटी के दाम और भी गिर सकते हैं, जबकि ला नीना, प्रतिबंध या मौसम संबंधी आपदाएं आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित कर सकती हैं, जिससे कीमतों में फिर तेजी लौट सकती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि एलपीजी और पेट्रोल की मजबूत मांग से भारत की तेल खपत में तेजी आई है। चीन और भारत दोनों ही 2025 और 2026 में वैश्विक तेल मांग वृद्धि में सबसे बड़े योगदानकर्ता के रूप में उभर सकते हैं।