विश्वभर में बढ़ती सप्लाई के चलते आने वाले वर्षों में क्रूड ऑयल की कीमतों में भारी गिरावट की संभावना जताई गई है। इस वर्ष अब तक ब्रेंट क्रूड के दामों में 14% की गिरावट दर्ज हुई है, और हालिया रिपोर्ट्स संकेत देती हैं कि यह दबाव अगले दो वर्षों में और बढ़ सकता है। जेपी मॉर्गन के अनुमान के अनुसार, वर्ष 2027 तक ब्रेंट क्रूड की सप्लाई इतनी बढ़ जाएगी कि इसकी कीमत प्रति बैरल 30 डॉलर तक गिर सकती है। रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में ही क्रूड 60 डॉलर से नीचे खिसक सकता है और वर्ष के अंत तक 50 डॉलर तक आ सकता है।
वर्ष 2027 में स्थिति और गंभीर हो सकती है क्योंकि बढ़ते सरप्लस के कारण ब्रेंट का औसत भाव 42 डॉलर तक आ सकता है। गोल्डमैन सैक्स ने भी बाजार में जरूरत से अधिक सप्लाई को लेकर चेतावनी दी है। उनके अनुसार, अमेरिकी बेंचमार्क WTI क्रूड का औसत भाव 2026 में 53 डॉलर रह सकता है, क्योंकि प्रतिदिन लगभग 20 लाख बैरल का सरप्लस बन रहा है। वर्ष 2026 में यह सरप्लस 28 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच सकता है। हालांकि 2027 में बाजार में फिर संतुलन लौटने की संभावना है।
क्रूड के दामों में गिरावट भारत के लिए कई तरह से फायदेमंद हो सकती है। प्रति बैरल 1 डॉलर की गिरावट भारत के चालू खाते के घाटे (CAD) में सालाना लगभग 1.5 से 1.6 अरब डॉलर का सुधार लाती है। 10 डॉलर की गिरावट CAD को GDP के 0.5% तक सुधार सकती है। भाव घटने से हिंदुस्तान पेट्रोलियम, भारत पेट्रोलियम और इंडियन ऑयल जैसी रिफाइनरी और मार्केटिंग कंपनियों को कम इनपुट लागत का सीधा लाभ मिलेगा।
टायर कंपनियाँ—अपोलो टायर, JK टायर, MRF—जो क्रूड आधारित सिंथेटिक रबर और कार्बन ब्लैक पर निर्भर हैं, जिन्हें उनके लागत का लगभग 50% माना जाता है, उन्हें भी इसका बड़ा फायदा होगा। पेंट कंपनियाँ—एशियन पेंट्स, बर्जर पेंट्स, कंसाई नेरोलैक, पीडिलाइट—के कुल खर्च में क्रूड का 30–40% हिस्सा है, जिससे सस्ते तेल से उनके मार्जिन में सुधार हो सकता है। सबसे अधिक लाभ एविएशन सेक्टर को मिलेगा, क्योंकि एयरलाइंस का सबसे बड़ा खर्च एविएशन टर्बाइन फ्यूल होता है। इंडिगो और स्पाइसजेट जैसी कंपनियों के लिए यह स्थिति बेहद फायदेमंद साबित हो सकती है।