अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों और भारत के प्रति उनके रुख के कारण भारतीय शेयर बाजार पर दबाव बढ़ गया है। विदेशी निवेशक दलाल स्ट्रीट से धन निकालकर अन्य उभरते बाजारों की ओर रुख कर रहे हैं। केवल पिछले चार हफ्तों में ही भारत-केंद्रित इक्विटी फंडों से 1.8 अरब डॉलर की निकासी हुई है, जो जनवरी 2025 के बाद का सबसे बड़ा आउटफ्लो माना जा रहा है।
दूसरी ओर, चीनी फंडों में 3 अरब डॉलर और हांगकांग फंडों में 4.5 अरब डॉलर का ताज़ा निवेश हुआ है। यह रुझान वैश्विक निवेशकों की प्राथमिकताओं में बड़े बदलाव का संकेत देता है, क्योंकि 2023-24 के दौरान भारत में बड़े पैमाने पर पूंजी प्रवाह देखने को मिला था। खासतौर पर अक्टूबर 2024 में ट्रंप की राष्ट्रपति पद पर जीत के बाद से भारत से पूंजी का बहिर्वाह तेज़ हो गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप के पदभार संभालने के बाद से भारत से अब तक कुल 3.7 अरब डॉलर की निकासी दर्ज हुई है, जबकि चीन में 5.4 अरब डॉलर का इनफ्लो हुआ है। यह स्थिति मार्च से सितंबर 2024 के बीच के परिदृश्य से बिल्कुल अलग है, जब भारत में 29 अरब डॉलर का इनफ्लो और चीन से 26 अरब डॉलर का आउटफ्लो दर्ज हुआ था।
हाल के 1.8 अरब डॉलर के आउटफ्लो में से 1 अरब डॉलर एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड (ETF) से और 770 मिलियन डॉलर एक्टिव फंडों से निकाले गए हैं। अप्रैल 2025 में ट्रंप के टैरिफ से जुड़ी चिंताओं के कारण अधिकांश इनफ्लो ETF में केंद्रित थे, लेकिन अक्टूबर से लंबी अवधि के फंडों में लगातार आउटफ्लो जारी है।
विज़डमट्री, इनवेस्को, श्रोडर, अमुंडी और फ्रैंकलिन इंडिया जैसे बड़े वैश्विक फंडों से विशेष रूप से लार्ज-कैप केंद्रित फंडों में भारी निकासी हुई है। हालांकि, घरेलू फंडों की मज़बूत खरीदारी से इस बिकवाली के प्रभाव को आंशिक रूप से संतुलित किया गया है।
नोमुरा की एक रिपोर्ट के अनुसार, उभरते बाजारों के 45 प्रमुख फंडों के विश्लेषण में सामने आया कि जुलाई में भारत में निवेश 110 बेसिस प्वाइंट घटा है। कुल 41 फंडों ने अपना हिस्सा कम किया, जिससे भारत अब MSCI इमर्जिंग मार्केट इंडेक्स की तुलना में 2.9 प्रतिशत अंडरवेट हो गया है। जुलाई तक 71 प्रतिशत फंड भारत के प्रति अंडरवेट रहे, जबकि जून में यह आंकड़ा 60 प्रतिशत था। इसके विपरीत हांगकांग, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे बाजारों में क्रमशः 80, 70 और 40 बेसिस प्वाइंट का निवेश बढ़ा है।
कुल मिलाकर, ट्रंप की नीतियों के बाद विदेशी निवेशकों का भरोसा भारत से हटकर चीन और अन्य एशियाई बाजारों की ओर अधिक होता दिखाई दे रहा है।