वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही में निफ्टी 50 कंपनियों की कमाई में उल्लेखनीय सुस्ती देखने को मिली है। बेंचमार्क इंडेक्स का ईपीएस (प्रति शेयर आय) सालाना आधार पर केवल 7.4% बढ़ा है, जो पिछले लगभग 24 वर्षों में सबसे कमजोर प्रदर्शन है। पिछले वर्ष इसी अवधि में ईपीएस वृद्धि दर 20.4% रही थी, जबकि इसके पहले दो वर्षों में औसतन 18% की वृद्धि दर्ज की गई थी।
इस बार की सुस्ती 2023 में दर्ज हुए कमजोर आँकड़ों से भी खराब मानी जा रही है, जब ईपीएस औसतन 8.8% बढ़ा था। मौजूदा तिमाही की यह धीमी रफ्तार दर्शाती है कि कमाई की रिकवरी फिर से अटकती हुई नजर आ रही है। ताज़ा आँकड़ों के अनुसार, इंडेक्स का पिछले 12 महीनों का ईपीएस 1,135.4 रुपये रहा है, जबकि सितंबर 2024 के अंत में यह 1,057.1 रुपये था।
दीर्घकालिक प्रवृत्तियों की तुलना में यह वृद्धि भी कमजोर है। पिछले 20 वर्षों में ईपीएस की औसत वृद्धि 12.6% और पिछले 10 वर्षों में 10.8% रही है। हालांकि, मूल्यांकन अभी भी मजबूत बना हुआ है। फिलहाल निफ्टी 50 करीब 21.8 गुना पिछली P/E मल्टीपल पर ट्रेड कर रहा है, जो 2024 के 23 गुना और 2023 के 22.3 गुना से कम है, लेकिन फरवरी 2025 के निचले स्तर से ऊपर है।
विश्लेषकों का कहना है कि सुस्ती के बावजूद निवेशक भविष्य की कमाई को लेकर आशावादी हैं। उनके अनुसार FY26 में निफ्टी 50 कंपनियों के लिए ईपीएस में 9% वृद्धि संभव है, जो मैक्रोइकोनॉमिक स्थितियों में सुधार और नीतिगत सहयोग से संभव हो सकती है।
हालांकि, बाजार के सामने चुनौतियाँ भी हैं। धीमी कमाई की दर और ऊँचे मूल्यांकन के चलते प्राइस-टू-अर्निंग ग्रोथ (PEG) अनुपात 52 महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुँच गया है। फिलहाल यह लगभग 3 गुना है, जबकि सितंबर 2024 में यह केवल 1.19 गुना था। विश्लेषक चेतावनी देते हैं कि यह स्थिति बाजार के मूल्यांकन और बुनियादी कारकों के बीच के अंतर को दर्शाती है।
सरकारी पूँजीगत खर्च में संभावित कमी और हाउसिंग सेक्टर में निवेश की कमजोरी से घरेलू माँग पर दबाव आ सकता है। इसके अलावा, वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं में कमजोर उपभोक्ता भावना और कॉर्पोरेट सेंटीमेंट के कारण निर्यात भी सीमित रहने की संभावना है।