स्मॉल और मिडकैप कंपनियों ने इस बार बड़ी कंपनियों की तुलना में कहीं अधिक कमाई की है। वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही में, निफ्टी-50 में शामिल बड़ी कंपनियों का प्रदर्शन कमजोर रहा है, जबकि छोटी और मध्यम आकार की कंपनियों ने मजबूत वृद्धि दिखाई है। निफ्टी-50 कंपनियों की बिक्री में केवल 6.4% की बढ़ोतरी हुई है, जो पिछले 17 तिमाहियों में सबसे कमजोर वृद्धि है। कमाई के मामले में भी बड़ी कंपनियां पिछड़ गई हैं। निफ्टी-50 कंपनियों के मुनाफे में केवल 1.2% की वृद्धि दर्ज हुई है, जो पिछले तीन वर्षों में सबसे कम है। इसके मुकाबले, देश की बाकी 2,647 लिस्टेड कंपनियों के कुल मुनाफे में 10.8% की मजबूत वृद्धि देखी गई है।
बड़ी कंपनियों की कमजोर कमाई के कारण कुल कॉर्पोरेट मुनाफे में उनका हिस्सा घटकर 50% पर आ गया है, जो पिछले पांच वर्षों का सबसे निचला स्तर है। तीन साल पहले यह हिस्सा लगभग 60% था। इस तिमाही में निफ्टी-50 कंपनियों का कुल मुनाफा 1.81 ट्रिलियन रुपये रहा। पिछले वर्ष की तुलना में थोड़ा अधिक, लेकिन पिछले चार तिमाहियों में सबसे कम। इसके मुकाबले, बाकी कंपनियों का मुनाफा बढ़कर 3.62 ट्रिलियन रुपये पर पहुंच गया है। मिडकैप और स्मॉलकैप कंपनियों की कमाई सबसे तेज रही है। मिडकैप-150 कंपनियों के मुनाफे में 27% और स्मॉलकैप-250 कंपनियों के मुनाफे में 37% का उछाल दर्ज किया गया है, जबकि बड़ी निफ्टी-100 कंपनियां केवल 10% वृद्धि के साथ पीछे रह गई हैं।
निजी बैंकों और बड़ी ऑटो कंपनियों के कमजोर परिणाम भी फ्रंटलाइन कंपनियों पर दबाव बढ़ा रहे हैं। विश्लेषकों का कहना है कि ऊर्जा, धातु, सीमेंट, इंफ्रास्ट्रक्चर, मटेरियल्स और ऑटो जैसे चक्रीय क्षेत्रों ने इस तिमाही की कमाई में सबसे बड़ा योगदान दिया है। इन क्षेत्रों की कई कंपनियां निफ्टी-50 में शामिल नहीं हैं, जबकि निफ्टी-50 का वजन बैंकिंग, आईटी, FMCG और तेल-गैस जैसे क्षेत्रों पर अधिक है, और इन क्षेत्रों में इस तिमाही में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को नहीं मिली। विश्लेषकों का मानना है कि बड़ी और छोटी कंपनियों के बीच का यह अंतर स्थायी नहीं है।
मिडकैप और स्मॉलकैप कंपनियों की तेज कमाई पिछले वर्ष के कमजोर आधार की वजह से है, और कुछ क्षेत्रों में दिखी तेजी अल्पकालिक भी हो सकती है। वहीं, बड़ी कंपनियों की कमाई आने वाले महीनों में सुधर सकती है, जिससे दोनों के बीच का अंतर कम हो सकता है। हालांकि, बाजार में उपलब्ध थोक डेटा से संकेत मिलता है कि टैक्स कटौती के बाद भी उपभोक्ताओं की खरीदारी में खास बढ़ोतरी नहीं हुई है। साथ ही हाल ही में निर्यात में गिरावट के कारण भविष्य में कॉर्पोरेट कमाई और वृद्धि पर दबाव बढ़ने की संभावना है।