वैश्विक स्तर पर तेजी (बुल रन) के माहौल के बावजूद भारतीय शेयर बाजार का प्रदर्शन हाल ही में खास उत्साहजनक नहीं रहा है। पिछले सप्ताह सेंसेक्स और निफ्टी दोनों अपने सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँचे थे, लेकिन एक वर्ष की रिटर्न तुलना करते ही बड़ा अंतर सामने आता है। मज़बूत मैक्रोइकोनॉमिक संकेतों के बावजूद पिछले एक साल में सेंसेक्स केवल 8.34% ही बढ़ा है, जिससे भारत का बाजार वैश्विक बेंचमार्क्स की तुलना में पिछड़ता नजर आता है। इससे संकेत मिलता है कि इंटरनेशनल कैपिटल मार्केट में भारत की अपील कमजोर पड़ रही है।
दुनिया के कई बड़े बाजारों ने पिछले एक वर्ष में भारत से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया है। दक्षिण कोरिया का KOSPI लगभग 60% उछला है, जबकि मेक्सिको का IPC इंडेक्स 62.29% बढ़ा है। एशियाई बाजारों में भी भारत पिछड़ता दिखाई देता है। हांगकांग का हैंग सेंग 33.13%, जापान का निक्केई 225 31.53% और स्पेन का IBEX-35 40.63% चढ़ गया है। यूरोप के बाजारों में लंदन का FTSE-100 17.29%, इटली का FTSE MIB 29.58% और ब्राजील का बोवेस्पा 26.58% बढ़ा है। आर्थिक चुनौतियों के बावजूद चीन ने भी 16.90% रिटर्न देकर भारत को पीछे छोड़ दिया है। इसके मुकाबले भारत, ऑस्ट्रेलिया और रूस के बाजारों का प्रदर्शन कमजोर रहा है। ऑस्ट्रेलिया सिर्फ 2.11% और रूस 3.82% बढ़ा है।
भारतीय इक्विटी मार्केट का यह नीरस प्रदर्शन मुख्यतः विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की लगातार बिकवाली के कारण है। NSDL के अनुसार जनवरी 2025 से अब तक FPI ने भारतीय शेयर बाजार से लगभग ₹1.48 लाख करोड़ तक की निकासी की है। आर्थिक मजबूती, स्थिर दरें और नियंत्रित महँगाई के बावजूद इतना बड़ा आउटफ्लो चिंता बढ़ाने वाला है। हालांकि, घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) और रिटेल निवेशकों की मजबूती ने बाजार को सहारा दिया है।
सेंसेक्स ने अप्रैल 2025 में 71,425 के स्तर से उछलकर 27 नवंबर 2025 को 86,055 का शीर्ष स्तर छुआ था, जबकि 4 दिसंबर को यह 85,265 पर बंद हुआ। इससे स्पष्ट है कि तेजी के बावजूद बाजार में ठोस स्थिरता और पारदर्शी वृद्धि की कमी है।